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सर्वकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 417 में से

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पृष्ठ 214

सूत्र ४६—४९ ] अध्याय २ १९३
कमलका पत्ता जलमे रहता हुआ जलसे लिप्त नहीं होता, वैसे ही वह जीवके
कर्मफलोसे लिप्त नही होता ( महाभारत शान्तिपर्व ३५१ । १४—१५) । इसी
प्रकार श्रुतिमें भी कहा है कि 'उन दोनोंमेंसे एक जीवात्मा तो पीपलके फलोंको
अर्थात् कर्मफलरूप सुख-दुःखोंको भोगता है और परमेश्वर न भोगता हुआ देखता
रहता है । (मु० उ० ३ । १ । १) इससे भी यही सिद्ध होता है कि परमात्मा
किसी प्रकारके दोषोंसे लिप्त नहीं होता ।
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'जब सभी जीव एक ही परमेश्वरके
अंश हैं, तब किसी एकके लिये जिस कामको करनेकी आज्ञा दी जाती है, दूसरे-
के लिये उसीका निषेध क्यों किया जाता है ? शास्त्रमें जीवोंके लिये भिन्न-भिन्न
आदेश दिये जानेका क्या कारण है ?' इसपर कहते हैं—
अनुज्ञापरिहारौ देहसम्बन्धाज्ज्योतिरा-
दिवत् ॥ २ । ३ । ४८ ॥
अनुज्ञापरिहारौ=विधि और निषेध; ज्योतिरादिवत्=ज्योति आदिकी
भाँति; देहसम्बन्धात्=शरीरोंके सम्बन्धसे हैं।
व्याख्या—भिन्न-भिन्न प्रकारके शरीरोंके साथ जीवात्माओंका सम्बन्ध होनेसे उनके
लिये अनुज्ञा और निषेधका भेद अनुचित नहीं है । जैसे, श्मशानकी अग्निको
त्याज्य और यज्ञकी अग्निको ग्राह्य बताया जाता है तथा जैसे शूद्रको सेवा करने-
के लिये आज्ञा दी है और ब्राह्मणके लिये सेवा-वृत्तिका निषेध किया गया है, इसी
प्रकार सभी जगह समझ लेना चाहिये । शरीरोंके सम्बन्धसे यथायोग्य भिन्न-भिन्न
प्रकारका विधि-निषेधरूप आदेश उचित ही है, इसमें कोई विरोध नहीं है ।
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि उक्त प्रकारसे विधि-निषेधकी
व्यवस्था होनेपर भी जीवात्माओंको विभु माननेसे उनका और उनके कर्मोंका
अलग-अलग विभाग कैसे होगा ? इसपर कहते हैं—
असन्ततेश्चाव्यतिकरः ॥ २ । ३ । ४९ ॥
च=इसके सिवा; असन्ततेः =( शरीरोंके आवरणसे ) व्यापकताका निरोध
होनेके कारण; अव्यतिकरः =उनका तथा उनके कर्मोंका मिश्रण नहीं होगा ।
व्याख्या—जिस प्रकार कारणशरीरका आवरण होनेसे सब जीवात्मा विभु होते
वे० द० १३—