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सर्वकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 213, कुल 417 में से

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१९२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
इस प्रकार स्मृतियोंद्वारा समर्थन किया जानेसे भी यह सिद्ध होता है कि
जीवात्मा परमेश्वरका अंश है ।
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि जीवात्मा ईश्वरका ही अंश
है, तब तो जीवके शुभाशुभ कर्मोंसे और सुख-दुःखादि भोगोंसे ईश्वरका भी
सम्बन्ध होता होगा, इसपर कहते हैं—
प्रकाशादिवन्नैवं परः ॥ २ । ३ । ४६ ॥
परः=परमेश्वर; एवम्=इस प्रकार जीवात्माके दोषोंसे सम्बद्ध; न=नहीं
होता; प्रकाशादिवत्=जिस प्रकार कि प्रकाश आदि अपने अंशके दोषोंसे लिप्त
नहीं होते ।
व्याख्या—जिस प्रकार प्रकाश सूर्य तथा आकाश आदि भी अपने अंश
इन्द्रिय आदिके दोषोंसे लिप्त नहीं होते, वैसे ही ईश्वर भी जीवोंके शुभाशुभ कर्म-
फलरूप सुख-दुःखादि दोषोंसे लिप्त नहीं होता । श्रुतिमें कहा है—
सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥
'जिस प्रकार समस्त लोकोंके चक्षुःस्वरूप सूर्यदेव चक्षुमें होनेवाले दोषोंसे
लिप्त नहीं होता, वैसे ही समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मा अद्वितीय परमेश्वर लोगोंके
दुःखोंसे लिप्त नहीं होता ।' ( क० उ० २ । २ । ११ )
सम्बन्ध—इसी बातको स्मृतिप्रमाणसे पुष्ट करते हैं—
स्मरन्ति च ॥ २ । ३ । ४७ ॥
स्मरन्ति=यही बात स्मृतिकार कहते हैं; च=और ( श्रुतिमें भी कही गयी है ) ।
व्याख्या—श्रीमद्भगवद्गीतादिमे भी ऐसा ही वर्णन मिलता है—
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय , न करोति न लिप्यते ॥
'अर्जुन ! यह अविनाशी परमात्मा अनादि और गुणातीत होनेके कारण
शरीरमें स्थित हुआ भी न तो स्वयं कर्ता है और न सुख-दुःखादि फलोंसे लिप्त
ही होता है ।' ( गीता १३ । ३१ ) इसी प्रकार दूसरी जगह भी कहा है कि
'उन दोनोंमें जो परमात्मा नित्य और निर्गुण कहा गया है, वह जिस प्रकार