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सर्वकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 417 में से

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पृष्ठ 174

सूत्र ३३-३५ ] अध्याय २ १५३
व्याख्या--जिस प्रकार एक पदार्थमें विरुद्ध धर्मोंको मानना युक्तिसङ्गत नहीं
है, उसी प्रकार आत्माको एकदेशीय अर्थात् शरीरके बराबर मापवाला मानना भी
युक्तिसङ्गत नहीं है; क्योकि किसी मनुष्यशरीरमे रहनेवाले आत्माको यदि उसके
कर्मवश कभी चींटीका शरीर प्राप्त हो तो वह उसमे कैसे समायेगा ? इसी तरह
यदि उसे हाथीका शरीर मिले तो उसका माप हाथीके बराबर कैसे हो
जायगा । इसके सिवा, मनुष्यका शरीर भी जन्मके समय बहुत छोटा-
सा होता है, पीछे बहुत बड़ा हो जाता है तो आत्माका माप किस
अवस्थाके शरीरके बराबर मानेंगे ? शरीरका हाथ या पैर आदि कोई
अंग कट जानेसे आत्मा नहीं कट जाता । इस प्रकार विचार करनेसे आत्माको
शरीरके बराबर माननेकी बात भी सर्वथा दोषपूर्ण प्रतीत होती है; अतः जैनमत
भी अनुपपन्न होनेके कारण अमान्य है ।
सम्बन्ध-यदि जैनीलोग यह कहें कि 'आत्मा छोटे शरीरमें छोटा और
बड़ेमें बड़ा हो जाता है, इसलिये हमारी मान्यतामें कोई दोष नहीं है' तो
इसके उत्तरमें कहते हैं-
न च पर्यायादप्यविरोधो विकारादिभ्यः ॥ २ । २ । ३५ ॥
च=इसके सिवा; पर्यायात्=आत्माको घटने-बढ़नेवाला मान लेनेसे;
अपि=भी; अविरोधः=विरोधका निवारण; न=नहीं हो सकता; विकारादिभ्यः=
क्योकि ऐसा माननेपर आत्मामें विकार आदि दोष प्राप्त होगे ।
व्याख्या-यदि यह मान लिया जाय कि आत्माको जब-जब जैसे मापवाला
छोटा-बड़ा शरीर मिलता है, तब-तब वह भी वैसे ही मापवाला हो जाता है, तो
भी आत्मा निर्दोष नहीं ठहरता; क्योकि ऐसा मान लेनेपर उसको विकारी,
अवयवयुक्त, अनित्य तथा इसी प्रकार अन्य अनेक दोषोसे युक्त मानना हो
जायगा । जो पदार्थ घटता-बढ़ता है, वह अवयवयुक्त होता है, किन्तु आत्मा
अवयवयुक्त नहीं माना गया है। घटने-बढ़नेवाला पदार्थ नित्य नहीं हो सकता,
परन्तु आत्माको नित्य माना गया है । घटना और बढ़ना विकार है, यह आत्मामे
सम्भव नहीं है, क्योकि उसे निर्विकार माना गया है । इस प्रकार घटना-बढ़ना
माननेसे अनेक दोष आत्मामे प्राप्त हो सकते हैं, अतः जैनियोंकी उपर्युक्त
मान्यता युक्तिसङ्गत नहीं है ।