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सर्वकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 417 में से

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पृष्ठ 162

सूत्र १६-१८ ] अध्याय २ १४१
है, वे उन कारणोंके विपरीत होंगे । यदि कहे कि विभिन्न भूतोके अनुसार उनके
कारणोंमे कहीं अधिक, कहीं कम गुण स्वीकार करनेसे यह दोष नहीं आवेगा, तो ठीक
नहीं है; क्योकि जिन परमाणुओमे अधिक गुण माने जायँगे, उनकी परमाणुता
ही नहीं रह जायगी; अतः परमाणुवाद किसी भी युक्तिसे सिद्ध नहीं होता है ।
सम्बन्ध—अब परमाणुवादको अग्राह्य बताते हुए इस प्रकरणको समाप्त
करते हैं—
अपरिग्रहाच्चात्यन्तमनपेक्षा ॥ २ । २ । १७ ॥
अपरिग्रहात्=परमाणुकारणवादको शिष्ट पुरुषोने ग्रहण नहीं किया है,
इसलिये; च=भी; अत्यन्तम् अनपेक्षा=इसकी अत्यन्त उपेक्षा करनी चाहिये ।
व्याख्या—पूर्वोक्त प्रधानकारणवादमे अंशतः सत्कार्यवादका निरूपण है ।
अतः उस सत्कार्यवादरूप अंशको मनु आदि शिष्टपुरुषोने ग्रहण किया है,
परन्तु इस परमाणु-कारणवादको तो किसी भी श्रेष्ठ पुरुषने स्वीकार नहीं किया
है, अतः यह सर्वथा उपेक्षणीय है ।
सम्बन्ध—पहले ग्यारहवेंसे सत्रहवेंतक सात सूत्रोंमें परमाणुवादका खण्डन
किया गया । अब क्षणिकवादका निराकरण करनेके लिये यह प्रकरण आरम्भ
करते हैं—
समुदाय उभयहेतुकेऽपि तदप्राप्तिः ॥ २ । २ । १८ ॥
उभयहेतुके=परमाणुहेतुक बाह्यसमुदाय और स्कन्धहेतुक आभ्यन्तर
समुदाय ऐसे दो प्रकारके; समुदाये=समुदायको स्वीकार कर लेनेपर; अपि=भी;
तदप्राप्तिः=उस समुदायकी प्राप्ति ( सिद्धि ) नहीं होती है ।
व्याख्या—बौद्धमतके अनुयायी परस्पर किञ्चित् मतभेदको लेकर चार
श्रेणियोंमे विभक्त हो गये हैं । उनके नाम इस प्रकार हैं—वैभाषिक, सौत्रान्तिक,
योगाचार तथा माध्यमिक । इनमे वैभाषिक और सौत्रान्तिक ये दोनो बाह्य
पदार्थोंकी सत्ता स्वीकार करते हैं । दोनोंमे अन्तर इतना ही है कि वैभाषिक
प्रत्यक्ष दीखनेवाले बाह्य पदार्थोंका अस्तित्व मानता है और सौत्रान्तिक विज्ञानसे
अनुमित बाह्य पदार्थोंकी सत्ता स्वीकार करता है । वैभाषिकके मतमें घट आदि
बाह्य पदार्थ प्रत्यक्ष प्रमाणके विषय हैं । सौत्रान्तिक घट आदिके रूपमे उत्पन्न