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सर्वकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 417 में से

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पृष्ठ 143

१२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
सम्बन्ध—इतना ही नहीं, निरवयव वस्तुसे विचित्र सावयव जगत्‌की सृष्टि
सांख्यवादी स्वयं भी मानते हैं । अतः—
स्वपक्षदोषाच्च ॥ २ । १ । २९ ॥
स्वपक्षदोषात्=उनके अपने पक्षमे ही उक्त दोष आता है, इसलिये; च=भी
( परब्रह्म परमेश्वरको ही जगत्‌का कारण मानना ठीक है ) ।
व्याख्या—यदि सांख्यमतके अनुसार प्रधानको जगत्‌का कारण मान लिया
जाय तो उसमे भी अनेक दोष आवेगे; क्योकि वह वेदसे तो प्रमाणित है ही
नहीं; युक्तिसे भी, उस अवयवरहित जड प्रधानसे इस अवयवयुक्त सजीव
जगत्‌की उत्पत्ति माननेमे विरोध आता है; क्योंकि सांख्यवादी भी प्रधानको न
तो सीमित मानते है, न सावयव । अतः उनके मतमें भी प्रधानका जगत्रूपमे
परिणत होना स्वीकार करनेपर पूर्वकथित सभी दोष प्राप्त होते हैं । अतः यही
ठीक है कि परब्रह्म परमेश्वर ही जगत्‌का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है।
सम्बन्ध—सांख्यादि मतोंकी मान्यतामें दोष दिखाकर अब पुनः अपने
सिद्धान्तको निर्दोष सिद्ध करते हुए कहते हैं—
सर्वोपेता च तद्दर्शनात् ॥ २ । १ । ३० ॥
च=इसके सिवा, वह परा देवता ( परब्रह्म परमेश्वर ); सर्वोपेता = सब
शक्तियोंसे सम्पन्न है; तद्दर्शनात्=क्योंकि श्रुतिके वर्णनमें ऐसा ही देखा जाता है।
व्याख्या—वह परमात्मा सब शक्तियोसे सम्पन्न है, ऐसी बात वेदमे जगह-
जगह कही गयी है । जैसे—'सत्यसङ्कल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः
सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः ॥' ( छा० उ० ३ । १४ । २ )
अर्थात् 'वह ब्रह्म सत्यसङ्कल्प, आकाशस्वरूप, सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस,
समस्त जगत्‌को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाणीरहित और मानरहित है ।'
यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः ।
तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥
( मु० उ० १ । १ । ९ )
'जो सर्वज्ञ, सबको जाननेवाला है, जिसका ज्ञानमय तप है, उसी परमेश्वर-
से यह विराट्रूपं जगत् और नाम, रूप तथा अन्न उत्पन्न होते हैं ।'