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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१०२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तेषां द्वादशसाहस्री युगसंख्या प्रकीर्त्तिता ।
कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चैव चतुष्टयम् ॥२९
अत्र संवत्सरा दृष्टा मानुषेण प्रमाणतः ।
कृतस्य तावद्वक्ष्यामि वर्षाणि च निबोधत ॥३०
सहस्राणां शतान्याहुश्चतुर्दश हि संख्यया ।
चत्वारिंशत्सहस्राणि तथान्यानि कृतं युगम् ॥३१
तथा शतसहस्राणि वर्षाणि दशसंख्यया ।
अशीतिश्च सहस्राणि कालस्त्रेतायुगस्य सः ॥३२
सप्तैव नियुतान्याहुर्वर्षाणां मानुषेण तु ।
विंशतिश्च सहस्राणि कालः स द्वापरस्य च ॥३३
तथा शतसहस्राणि वर्षाणि त्रीणि संख्यया ।
षष्टिश्चैव सहस्राणि कालः कलियुगस्य तु ॥३४
एवं चतुर्युगे काल ऋतै संध्यांशकैः स्मृतः ।
नियुतान्येव षड्विंशन्निरसानि युगानि वै ॥३५
चत्वारिंशत्तथा त्रीणि नियुतानीह संख्यया ।
विंशतिश्च सहस्राणि स संध्यांशश्चतुर्युगः ॥३६
एवं चतुर्युगाख्यानां साधिका ह्येकसप्ततिः ।
कृतत्रेतादियुक्तानां मनोरन्तरमुच्यते ॥३७

उनकी बारह सहस्रों वाली युगों की संख्या कीर्तित की गयी है । इस प्रकार से कृतयुग-त्रेता-द्वापर और कलियुग इन चार युगों की चौकड़ी है ।२९। यहाँ पर मानुष प्रमाण से सम्वत्सर देखे गये हैं। अब कृत युग के वर्षों को बतलाऊँगा । उनको भली भाँति समझ लीजिए ।३०। संख्या के द्वारा चौदह सौ सहस्र कहे गये हैं । तथा अन्य चालीस सहस्र कृतयुग हैं ।३१। दश की संख्या से सो सहस्र वर्ष हैं। वह अस्सी सहस्र काल त्रेतायुग का होता है ।३२। मानुष प्रमाण से सात ही विपुल वर्ष कहे गये हैं । और द्वापर युग का काल बीस सहस्र वर्ष होता है ।३३। संख्या से तीन शत सहस्र वर्ष कलियुग का काल होता है ।३४। इस प्रकार से इन चार युगों में ऋत संध्यांशों