संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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गन्धर्व वदन ! श्री सम्पन्न अनेक वृक्षों के सप्तक से प्रथमोद्यान का पालक महाकाल मयाश्रित है । चतुरशारण चक्र आपने उसका कीर्तित किया है । अन्यों का छै ऋतुएँ कल्पोद्यान वाटिकाओं में पाला है—यह भी सुना है और आप से चक्र की देवियाँ नही सुनी हैं ।४०-४१। अतएव वसन्त आदि चक्र के आवरण देवता आप क्रम से बताइए । क्योंकि आप तो महान सर्वज्ञ महापुरुष हैं ।४२।
हयग्रीव उवाच—
आकर्णय मुनिश्रेष्ठ तत्तच्चक्रस्थदेवता ।।४३
कालचक्रं पुरा प्रोक्तं वासन्तं चक्रमुच्यते ।
त्रिकोणं पञ्चकोणं च नागच्छदसरोरुहम् ।
षोडशारं सरोजं च दशारद्वितयं पुनः ।।४४
चतुरस्रं च विज्ञेयं सप्तावरणसंयुतम् ।
तन्मध्ये बिन्दुचक्रस्थो वसन्तर्तु महाद्युतिः ।।४५
तदेकद्वयसंलग्ने मधुश्रीमाधवश्रियो ।
उभाभ्यां निजहस्ताभ्यामुभयोस्तनमेककम् ।।४६
निपीडयन्स्वहस्तस्य युगलेन ससौरभम् ।
सपुष्पमदिरापूर्णचषकं पिशितं वहन् ।।४७
एवमेव तु सर्वर्तुं ध्यानं विन्ध्यनिषूदन ।
वर्षर्तौस्तु पुनर्ध्याने शक्तिद्वितयमादिमम् ।
अंकस्थितं तु विज्ञेयं शक्तयोऽन्याः समीपगाः ।।४८
अथ वासन्तचक्रस्थदेवीः शृणु वदाम्यहम् ।
मधुशुक्लप्रथमिका मधुशुक्लद्वितीियका ।।४९
श्री हयग्रीवजी ने कहा—हे मुनिश्रेष्ठ ! आप उन-उन चक्रों में स्थित देवताओं को श्रवण कीजिए ।४३। पहिले हमने कालचक्र बता दिया है । अब वासन्त बताया जाता है । त्रिकोण पञ्चकोण नागच्छद सरोरुह है । सोलह आर हैं ऐसा सरोज है फिर चौबीस हैं ।४४। सात आवरणों से युक्त चतुरस्र जान लेना चाहिए । उसके मध्य में बिन्दुचक्र में स्थित महान् द्युति वाला