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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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श्रीनगर त्रिपुरा सप्त कक्षा वर्णन ] [ ४५५

मातंगकन्यका हृद्याः कोटीनामपि कोटिशः ।
लघुश्यामा महाश्यामामातंगी वृन्दसंयुताः ।
अङ्गशक्तित्वमापन्नाः सेवन्ते प्रियकप्रियाम् ॥१०५
इति मातंगकन्यानामुत्पत्तिः कुम्भसंभव ।
कथिताः सप्तकक्षाश्च शाला लोहादिनिर्मिताः ॥१०६

दोनों में गुणों की समता मित्रों में हो तो ठीक है यदि किसी में भी अधिक गुण होते हैं तो एक के कारण से दूसरे में भी स्पृहा हो जाया करती है ।६६। गौरी गुरुत्व की श्लाघा के लिए प्राप्ति कामना वाले मैंने तप किया था सो हे मन्त्रिणीनाथे ! अब आप मेरी पुत्री हो जावें ।१००। क्योंकि मेरे नाम से आप विख्यात होंगी—इसमें संशय नहीं है । मातंग महामुनि के इस वचन को सुनकर 'ऐसा ही होगा'—यह कहकर वह तिरोहित हो गयी थीं और मुनि बहुत प्रसन्न हुए थे ।१०१। उस समय में मातंग मुनि के स्वप्न के प्रसन्नता से कर्णावतंस से एक तापिच्छ की मंजरी प्रदान की थी । ।१०२। उस स्वप्न के प्रभाव से मातंग की सहधर्मिणी ने जिसका नाम सिद्धि मती था गर्भ में लघुश्यामा को धारण किया था ।१०३। उसी से जो समु-त्पन्न हुई थी इसी कारण से मातंगी कही गयी है । वह लघुश्यामा भी कही गयी थी क्योंकि उसकी मूलकन्द भू श्यामा थी ।१०४। मातंग की कन्याएं बड़ी सुन्दर थीं तथा करोड़ों थी । लघुश्यामा-महाश्यामा वृन्द संयुत मातंगी अङ्ग शक्तित्व को प्राप्त हुईं प्रियक प्रिया की सेवा किया करती हैं ।१०५। हे कुम्भसम्भव ! यही मातंग कन्याओं की उत्पत्ति है लोहादि से निर्मित सप्त कक्षा शालाएं भी कह दी गयी हैं ।१०६।

श्रीनगर त्रिपुरा सप्त कक्षा वर्णन

अगस्त्य उवाच-
लोहादिसप्तशालानां रक्षका एव सन्ति वै ।
तन्नामकीर्तय प्राज्ञ येन मे संशयच्छिदा ॥१

हयग्रीव उवाच-
नानावृक्षमहोद्याने वर्तते कुम्भसंभव ।
महाकालः सर्वलोकभक्षकः श्यामविग्रहः ॥२