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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

पृथ्वी व्यायाम विस्तारः ] [ ८७

चत्वारिंशत्सहस्राणि योजनानां समंततः ॥४५
अष्टाभिरधिकानि स्युस्त्र्यस्रे मानं प्रकीर्त्तितम् ।
चतुरस्रेण मानेन परिणाहः समंततः ॥४६
चतुःषष्टिसहस्राणि योजनानां विधीयते ।
स पर्वतो महादिव्यो दिव्योषधिसमन्वितः ॥४७
भुवनैरावृतः सर्वो जातरूपमयैः शुभैः ।
तत्र देवगणाः सर्वे गंधर्वोरगराक्षसाः ॥४८
शैलराजे प्रदृश्यंते शुभाश्चाप्सरसां गणाः ।
स तु मेरुः परिवृतो भुवनैर्भूतभावनैः ॥४९

वह चौरासी सहस्र योजन ऊँचा है । एक योजन चार कोस का होता है । सोलह योजन नीचे की ओर प्रविष्ट है और सोलह ही योजन विस्तार वाला है ।४३। शराव संस्थित होने से बत्तीस योजन मूर्धा में विस्तृत है । विस्तार में सभी ओर उसका तिगुना परिणाम है ।४४। मण्डल प्रमाण से उसका मान त्र्यस्र अभीष्ट होता है । सब ओर चौवालीस सहस्र योजन है ।४५। त्र्यस्र में अर्थात् तीनों ओर में उसका मान आठ अधिक योजन कहा गया है । सभी ओर चतुरस्र मान से परिणाम होता है ।४६। चौंसठ सहस्र योजन कहा जाता है । वह पर्वत बहुत ही अधिक दिव्य है और दिव्य औषधियों से समन्वित है ।४७। यह सम्पूर्ण सुवर्णमय परम शुभ भुवनों से घिरा हुआ है । वहाँ पर समस्त देवों के गण—गन्धर्व—और राक्षस निवास किया करते हैं ।४८। उस शैलों के राजा के ऊपर शुभ अप्सराओं के समुदाय भी दिखलाई दिया करते हैं । वह मेरु पर्वत भूतों के भावन भुवनों से परिवृत रहा करता है ।४९।

चत्वारो यस्य देशा वै चतुः पार्श्वेष्वधिष्ठिताः ।
भद्राश्वा भारताश्चैव केतुमालाश्च पश्चिमाः ॥५०
उत्तराः कुरवश्चैव कृतपुण्यप्रतिश्रयाः ।
गंधमादनपार्श्वे तु परेषाऽपरगंडिका ॥५१
सर्वर्तु रमणीया च नित्यं प्रमुदिता शिवा ।
द्वात्रिंशत्तु सहस्राणि योजनैः पूर्वपश्चिमात् ॥५२