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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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८६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

उदगायतो महाशैलो माल्यवान्नाम नामतः ॥३८
योजनानां सहस्रं तु आनील निषधायतः ।
आयामतश्चतु स्त्रिंशत्सहस्राणि प्रकीर्तितः ॥३९
तस्य प्रतीच्यां विज्ञेयः पर्वतो गंधमादनः ।
आयातमतोऽथ विस्तारान्माल्यवानिति विश्रुतः ॥४०
परिमंडलयोर्मेरुर्मध्ये कनकपर्वतः ।
चतुर्वर्णः स सोवर्णः चतुरस्रः समुच्छ्रितः ॥४१
सुमेरुः शुशुभे शुभ्रो राजवत्समधिष्ठितः ।
तरुणादित्यवर्णाभो विधूम इव पावकः ॥४२

इसके अनन्तर निषध के नीचे वेदी के अर्धभाग दक्षिण कहा गया है। नीलवान् है और जो वेद्यर्ध है वह उत्तर है ।३६। वेद्यर्ध दक्षिण और उत्तर में तीन-तीन वर्ष है। उन दोनों के मध्य में मेरु जानना चाहिए और मध्य में इलावृत है ।३७। नील के दक्षिण दिशा की ओर और निषध की उत्तर की ओर—उत्तर की ओर आयत एक महान् शैल है जो नाम से माल्यवान कहा जाता है ।३८। एक सहस्र योजन नील और निषध तक आयत है और आयाम से यह चौबीस सहस्र योजन कहा गया है ।३९। इसके पश्चिम में गन्धमादन नामक पर्वत जानने के योग्य है। आयाम (चौड़ाई) और विस्तार से माल्यवान्—इस नाम से यह प्रसिद्ध है ।४०। परिमण्डलों के मध्य में मेरु पर्वत है जो कनक पर्वत है। वह चार वर्णों वाला और सुवर्ण का तथा चतुरस्र अर्थात् चौकोर समुच्छ्रित है ।४१। सुमेरु शोभाशाली होता था जो परम शुभ्र है और एक राजा के ही समान समधिष्ठित रहता है। इसके वर्ण की आभा तरुण सूर्य के ही समान है तथा बिना धुँआ वाली अग्नि के तुल्य है ।४२।

योजनानां सहस्राणि चतुरशीतिरुच्छ्रितः ।
प्रविष्टः षोडशाधस्ताद्विस्तृतः षोडशैव तु ॥४३
शरावसंस्थितत्वात्तु द्वात्रिंशन्मूर्धिन विस्तृतः ।
विस्तारात्त्रिगुणस्तस्य परिणाहः समंततः ॥४४
मंडलेन प्रमाणेन द्व्यस्रं मानं तदिष्यते ।