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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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भंडासुर वध वर्णन ] [ ४११

धूम्राभिधानाश्च परे तस्मादस्त्रात्समुत्थिताः ।
ते सर्वे दानवश्रेष्ठाः कठोरैः शस्त्रमण्डलैः ॥७७॥

उस महेशानी को नमस्कार करके उसके भक्तों ने व्याधि मर्दन को करने के लिए तीनों लोकों में नियुक्त अपने स्थान को चले गये थे । शरों से उत्थित अच्युत-अनन्तर और गोविन्द हुङ्कार मात्र से ही रोगों को दग्ध करके उनको प्रसन्न किया था ।७१-७२। इसके उपरान्त उस महान् भीषण युद्ध स्थल में पराक्रमी फिर भण्ड ने आयुर्नाशन अस्त्र छोड़ा था और राज्ञी ने काल संकर्षिणी रूप अस्त्र को प्रयुक्त किया था ।७३। भंड दानव ने उद्दाम महासुरास्त्र को छोड़ दिया था । उससे सहस्रों ही महाकाय और महाबली उत्पन्न हो गये थे । मधु-कैटभ- महिषासुर-धूम्रलोचन और चंड-मुंड प्रभृति असुर थे ।७४-७५। चिक्षुम-चामर-रक्तबीज-निशुम्भ और महान् बलवान कालकेय थे ।७६। दूसरे धूमाभिधान वाले उस अस्त्र से उत्थित हो गये थे । वे सभी श्रेष्ठ दानव कठोर शस्त्रों के मंडलों से प्रहार कर रहे थे ।७७।

शक्तीसेना मर्दयन्तो नर्दन्तश्च भयंकरम् ।
हाहेति क्रन्दमानाश्च शक्तयो दैत्यमर्दिताः ॥७८॥
ललितां शरणं प्राप्ताः पाहि पाहीति सत्वरम् ।
अथ देवी भृशं क्रुद्धा रुषाट्टहासमातनोत् ॥७९॥
ततः समुत्थिता काचिद्दुर्गा नाम यशस्विनी ।
समस्तदेवतेजोभिर्निर्मिता विश्वरूपिणी ॥८०॥
शूलं च शूलिना दत्तं चक्रं चक्रिसमर्पितम् ।
शंखं वरुणदत्तञ्च शक्तिं दत्तां हविर्भुजा ॥८१॥
चापमक्षयतूणीरौ मरुद्दत्तौ महामृधे ।
वज्रिदत्तं च कुलिशं चषकं धनदार्पितम् ॥८२॥
कालदण्डं महादण्डं पाशं पाशधरार्पितम् ।
ब्रह्मदत्तां कुण्डिकां च घण्टामैरावतार्पिताम् ॥८३॥
मृत्युदत्तौ खड्गखेटौ हारं जलधिनार्पितम् ।
विश्वकर्मप्रदत्तानि भूषणानि च बिभ्रती ॥८४॥