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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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३८० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

उस अग्नि प्राकार के वलय से गजानन निकलकर चले थे ।८३। उनके क्रोध
पूर्ण हुङ्कार से वे परम तुमुल थे और ये सब दानवों के समीप में प्राप्त हो
गये थे । फिर इनकी बड़ी प्रचण्ड फूत्कार थी जिससे विष्टपों को भी बहि-
राकर दिया था ।८४।

पपात दैत्यसैन्येषु गणचक्रचमूगणः ।
अच्छिदन्निशितैर्बाणैर्गणनाथः स दानवान् ॥८५
गणनाथेन तस्याभूद्विशुक्रस्य महौजसः ।
युद्धमुद्धतहुंकारभिन्नकार्मुकनिः स्वनम् ॥८६
भ्रुकुटी कुटिले चक्रे दष्टोष्ठमतिपाटलम् ।
विशुक्रो युधि विभ्राणः समयुध्यत तेन सः ॥८७
शस्त्राघट्टननिस्वानैर्हुंकारैश्च सुरद्विषाम् ।
दैत्यसप्तिखुरक्रीडत्कुद्दालीकूटनिस्वनैः ॥८८
फेत्कारैश्च गजेन्द्राणां भयेनाक्रन्दनैरपि ।
ह्रेषया च हयश्रेण्या रथचक्रस्वनैरपि ॥८९
धनुषां गुणनिस्स्वानैश्चक्रचीत्कारणैरपि ॥९०
शरसात्कारघोषैश्च वीरभाषाकदम्बकैः ।
अट्टहासैर्महेंद्राणां सिंहनादैश्च भूरिशः ॥९१

गण चक्र की सेना का समुदाय दैत्यों की सेना में कूद पड़ा था । उन
गणनाथ ने अपने तीक्ष्ण बाणों से दानवों को छेद दिया था ।८५। उस गण-
नाथ का महान ओज वाले विशुक्र के साथ बड़ा भीषण युद्ध हुआ था जिसमें
बहुत उद्धत हुङ्कारें हो रही थीं और धनुषों की टंकार की ध्वनि भी थी ।
।८६। विशुक्र ने भौंहें टेढ़ी कर ली थीं और उसके दांत और होठ पाटल
वर्ण के थे । ऐसे उसने गणनाथ के साथ युद्ध किया था ।८७। शस्त्रों के
घट्टन के शब्दों से और असुरों की हुङ्कारों से तथा दैत्यों की सप्तति की
खुरों की क्रीड़ा से कुद्दालियों के कूट घोषों से दिशाएँ क्षुब्ध हो रही थीं ।
।८८। गजेन्द्रों के फेत्कारों से तथा भय से आक्रन्दनों से—घोड़ों के हिन-
हिनाने से और रथों के पहियों की ध्वनियों से भी सब दिशाएँ कांपने लगी
थीं ।८९। धनुषों की डोरी की ध्वनियां तथा चक्र के चीत्कारें भी उस समय