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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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पृष्ठ 785

गणनाथ पराक्रम वर्णन ] [ ३७५

आवश्यकता है। यह युद्ध जो देश और शस्त्रों की क्षति करने वाला है अब शान्त हो जाना चाहिए ॥४७॥ और युद्ध में मरण होने वाला है तो हमारा जीवन भी वृथा ही है। युद्ध में तो मौत ही होगी वहां पर प्रभा ही क्या है ॥४८॥ इस उत्साह से कोई भी फल नहीं है अतःनिद्रा ही सुख देने वाली है। आलस्य के तुल्य चित्त को विश्रान्ति देने वाला अन्य कोई भी नहीं है ॥४६॥

एतादृशींश्च नो ज्ञात्वा सा राज्ञी किं करिष्यति ।
तस्या राज्ञीत्वमपि नः समवायेन कल्पितम् ॥५०॥
एवं चोपेक्षितास्माभिः सा विनष्टबला भवेत् ।
नष्टसत्त्वा च सा राज्ञी कान्नः शिक्षां करिष्यति ॥५१॥
एवमेव रणारंभं विमुच्य विधृतायुधाः ।
शक्तयो निद्रया द्वारे घूर्णमाना इवाभवन् ॥५२॥
सर्वत्र मांद्यं कार्येषु महदालस्यमागतम् ।
शिथिलं चाभवत्सर्वं शक्तीनां कटकं महत् ॥५३॥
जयविघ्नं महायन्त्रमिति कृत्वा सा दानवः ॥५४॥
निर्विद्य तत्प्रभावेण कटकं प्रमिमंथिषुः ।
द्वितीययुद्धदिवसस्यार्धरात्रे गते सति ॥५५॥
निस्सृत्य नगराद्भूयस्त्रिंशदक्षौहिणीवृतः ।
आजगाम पुनर्देत्यो विशुक्रः कटकं द्विषाम् ॥५६॥
अश्रूयत ततस्तस्य रणनिःसाणनिस्वनाः ।
तथापि ता निरुद्योगाः शक्तयः कटकेऽभवन् ॥५७॥

हमको ऐसी जानकर वह राज्ञी क्या करेगी। उसको राज्ञी बना देना भी तो हम ही सबने कल्पित किया है ॥५०॥ इस रीति से हमारे द्वारा जब वह उपेक्षित होगी तो वह भी नष्ट बल वाली ही हो जायगी। जब नष्ट बल वाली राज्ञी होगी तो फिर वह हमको क्या शिक्षा देगी ॥५१॥ इसी प्रकार से उन शक्तियों ने रणारम्भ को त्याग दिया था और सब हथियार छोड़ दिये थे। वे निद्रा से घूर्णित होती हुई द्वार पर ही रह गयी थी ॥५२॥ सर्वत्र कार्यों में मन्दता आ गयी और मदालस्य छा गया था। वह महान शक्तियों का कटक उस समय में शिथिल हो गया था ॥५३॥ यह महायन्त्र