सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 753, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 753

विषंग पलायन वर्णन ] [ ३४३

उस प्रकार से वर्त्तमान तथा अतादृशों की शरणागति के उद्यम
वाली को देखा था। उसके सामने महान् सेना कौतुक पूर्वक देख रही थी
।५७। बुरे आशय वाले विषंग ने उसी को मान लिया था कि यही वह देवी
है। उस रथेन्द्र के पीछे की ओर में सैनिकों द्वारा घट्टन किया था।५८। वहाँ
पर अणिमा आदि शक्तियों के परिवार की सेनाओं ने महान् कलकल किया
था अणिमा आदिक सैकड़ों से भी अधिक थीं ।५६। पट्टिश—द्रुघण—भिन्दि-
पाल—भुशुण्डी—कठोर वज्र के समान निर्घात से निष्ठुर शक्तियों के
मण्डलों से युद्ध हुआ था।६०। महान् सत्त्व वाले असुर मर्दन करते हुए उस
समर को बहुत मानने लगे थे । उस रथ में संस्थित शक्तियों का मण्डल
अचानक रणोत्साह के विपर्ययं से आविष्ट विग्रहों वाला हो गया था और
अनवसर में क्षोभयुत हुआ था। अन्धकारों ने अदृश्य विपाटों से पाटित कर
दिया था ।६१-६२। इसके अनन्तर वे नवम चक्र रथेन्द्र के पर्व पर संस्थित
थे । अदृश्यमान निजवर्मों वाले—अदृश्य शस्त्रों वाले तथा अन्धकार से छन्न
स्वरूपों वाले दानवों के बाणों से शक्तियों का मण्डल छन्नवर्मित की भाँति
इधर-उधर बहुत कष्टित हुआ था ।६३-६४।

शक्तीनां मंडलं तेने क्रन्दनं ललितां प्रति ।
पूर्वानुक्रमतस्तत्र संप्राप्तं सुमहद्भयम् ॥६५
कर्णाकर्णिकयाकर्ण्य ललिता कोपमादधे ।
एतस्मिन्नंतरे मंडश्चंडदुर्मंत्रिपंडितः ॥६६
दशाऽक्षौहिणिकायुक्तं कुटिलाक्षं महौजसम् ।
ललितासैन्यनाशाय युद्धाय प्रजिघाय सः ॥६७
यथा पश्चात्कलकलं श्रुत्वाग्रे वर्तिनी चमूः ।
नागच्छति तथा चक्रे कुटिलाक्षो महारथम् ॥६८
एवं चोभयतो युद्धं पश्चादग्रे तथाऽभवत् ।
अत्यन्ततुमुलं चासीच्छक्तीनां सैनिके महत् ॥६६
नक्तसत्त्वाश्च दैत्येन्द्रास्तिमिरैण समावृताः ।
इतस्ततः शिथिलतां कंटके निन्युरुद्धताः ॥७०

और उसने ललिता देवी के पास क्रन्दन किया था। वहाँ पर पूर्व
अनुक्रम से महान् भय प्राप्त हो गया था ।६५। कानों-कानों से ललिता देवी