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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 728

३१८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

मुदितास्ते पुनर्भीत्या शून्यकायां पलायिताः ॥६८
तदुदंतं ततः श्रुत्वा भंडश्चंडो रुषाभवत् ॥६६

उस नकुलेश्वरी ने उनके साथ अनेक प्रकार से संग्राम करते हुए पट्टिश से करङ्क का शिर को काट दिया था जो महान कठिन था ।६२। वे चार शत्रु थे जिनमें काकवाशित प्रमुख था। ऊपर की ओर उछाल खा-खाकर तार्क्ष्य खड्ग से उनका शिर काट दिया था ।६३। श्यामलाम्बिका ने उस तरह की हाथ की सफाई नकुली की देखी थी और उसको महान सत्व वाली और दुष्ट असुरों के विनाश करने वाली को बहुत मान लिया था । फिर उस श्यामाम्बिका ने अपने अंग का जो देव तत्त्व था वह उसको दे दिया था ।६४-६५। जब अलौकिक गुण दिखाई देता है तो किसके हृदय में प्रीति समुत्पन्न नहीं हुआ करती है । जो भी नकुल मरने से बचे हुए थे वे बहुत ही भयभीत होकर उन नकुली की शरण में गये थे ।६६। उसने भी उनको देखकर कि ये डरे हुए हैं कृपा करके कहा था—डरो मत—और वह हँस गयी थी । उसने कहा था कि आप अपने राजा को इस संग्राम का सब समाचार बतादो ।६७। इस रीति से उस देवी के द्वार भेजे गये उनने उस समय में युद्ध भूमि का अवलोकन किया था और वे भय से मुदित होकर फिर सब शून्य का नगरी में भाग कर चले गये थे ।६८। उस समाचार को सुनकर वह प्रचण्ड भण्डासुर बड़ा क्रुद्ध हुआ था ।६६।


वलाहाकादि सप्त सेनापति वध वर्णन

हतेषु तेषु रोषांधो निश्वसञ्छून्यकेश्वरः ।
कुजलाशनिमिति प्रोचे युयुत्साव्याकुलाशयः ॥१

भद्र सेनापतेऽस्माकमभद्रं समुपागतम् ।
करंकाद्याश्चमूनाथाः कन्दलद्भुजविक्रमाः ॥२

सर्पिणीमायया सर्वगीर्वाणमदभंजनाः ।
पापीयस्या तया गूढमायया विनिपातिताः ॥३

बलाहकप्रभृतयः सप्त ये सैनिकाधिपाः ।
तानुदग्रभुजांस्त्वान्प्राहिणु प्रधनं प्रति ॥४