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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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पृष्ठ 716

३०६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

जिस समय में इतनी विशाल सेनाएं धावा करने के लिए ललिता देवी के सैनिक की ओर आ रही थीं तो सभी देवगण शक्तियों के भङ्ग की शंका से डर गये थे ॥१५॥ वे करंक जिनमें प्रमुख था पाँचों सेनापति गण बहुत ही उद्धत थे । उन्होंने सर्पिणी नाम वाली एक महती माया को उस समर स्थल में किया था ॥१६॥ उनके द्वारा उठी हुई वह दुष्टा रणशाम्बरी सर्पिणी धूम्र वर्ण की थी । उसके होठ भी धूम्र वर्ण के ही थे और धूम्र ही उसके पयोधर थे ॥१७॥ वह महासागर के ही तुल्य अत्यन्त गम्भीर कुहर उदर वाली थी । वह रणस्थल में मन को भयभीत करती हुई ही शक्तियों के आगे चली थी ॥१८॥ वह बहुत से सर्पों के भूषण वाली दूसरी कद्रू के ही समान थी और बहुत ही दुष्टा थी । वह माया से परिपूर्ण सर्पों के जनन का स्थान थी ॥१६॥ सेनापतियों के नासीर में महीतल को वेल्लित करती हुई वह जा रही थी । उसका महान घोर शब्द था जिसको वह कर रही थी और प्रायः उसने उस चक्र को वेल्लित सा कर दिया था ॥२०॥ वे पाँचों सेनापति भी पञ्चत्व (मृत्यु) के ही कामुक थे और वे करंक आदि सब बहुत ही दुरात्मा थे । उसी भाँति से माया के साथ पूर्व में सब असुरेन्द्र अजित हो रहे थे ॥२१॥

अथ प्रवृत्ते युद्धं शक्तीनाममरद्रुहाम् ।
अन्योन्यवीरभाषाभिः प्रोत्साहितघनक्रुधाम् ॥२२
अत्यंतसंकुलतया न विज्ञातपरस्पराः ।
शक्तयो दानवश्चैव प्रजह्रुः शस्त्रपाणयः ॥२३
अन्योन्यशस्त्रसंघट्टसमुत्थितहुताशने ।
प्रवृत्तविशिखस्रोतः प्रच्छन्नहरिदन्तरे ॥२४
बहुरक्तनदीपूरह्रियमाणमतंगजे ।
मांसकदमनिर्मग्ननिष्पंदरथमंडले ॥२५
विकीर्णकेशशैवालविलसद्रक्तनिर्झरे ।
अतिनिष्ठुरविध्वंसि सिंहनादभयङ्करे ॥२६
रजोऽन्धकारतुमुले राक्षसीतृप्तिदायिनि ।
शस्त्रीशरीरविच्छिन्न दैत्यकंठोत्थितासृजि ॥२७