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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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पृष्ठ 644

२३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

वन्दना की थी । वे बार-बार उसके द्वादश नामों का नभस्तल में कीर्त्तन
कर रहे थे ।१६। अगस्त्य जी ने कहा—हे प्रभो ! वे उस देवीके बारह नाम
कौन से हैं उनको कृपया बतलाइए। हे अश्वानन ! आप तो महान् विद्वान्
हैं। मेरे हृदय में इनके ज्ञान प्राप्त करने का बड़ा भारी कौतुक विद्यमान है।
।१७। श्री हयग्रीवजी ने कहा—हे घटोद्भव ! अब आप उस देवी के द्वादश
नामों का श्रवण कीजिए जिन नामों के केवल श्रवण करने ही से वह परम
प्रसन्न हो जाया करती है। पञ्चमी—दण्डनाथा—संकेता—समयेश्वरी—
समय संकेता—वाराही—पोत्रिणी—वार्त्ताली—महासेना—आज्ञा-चक्रेश्वरी
—और अरिध्वनी—हे मुने ! ये ही उस देवी के द्वादश नाम हैं जिनको मैंने
आपके सामने कहकर बता दिया है। यह द्वादश नामों का एक वज्र का
पञ्जर है। इसके मध्य में रहने वाला अर्थात् इन बारह नामों का पाठ
करने वाला बहुत ही सुरक्षित रहता है जैसे मानों वह वज्र निर्मित पञ्जर
में बैठा होवे। वह मानव संकट में भी कभी दुःख नहीं पाता है। इन्हीं
नामों के द्वारा गगन में संस्थित देवों ने उस देवी संकेता की बहुत स्तुति की
थी। उन सब पर अनुग्रह करने के लिए उसका हृदय पसीज गया था और
फिर वह प्रचलायमान हो उठी थी ।१८-२१।

अथ संकेतयोगिन्या मंत्रनाथा पदस्पृशः ।
निर्याणसूचनकरी दिवि दध्वान काहली ॥२२
शृङ्गारप्रायभूषाणां शार्दूलश्यामलत्विषाम् ।
वीणासंयतपाणीनां शक्तीनां निर्ययौ बलम् ॥२३
काश्चिद्गायन्ति नृत्यंति मत्तकोकिलनिःस्वनाः ।
वीणावेणुमृदंगाद्याः सविलासपदक्रमाः ॥२४
प्रचेलुः शक्तयः श्यामा हर्षयंत्यो जगज्जनान् ।
मयूरवाहनाः काश्चित्कतिचिद्धंसवाहनाः ॥२५
कतिचिन्नकुलारूढाः कतिचित्कोकिलासनाः ।
सर्वाश्च श्यामलाकाराः काश्चित्कर्णीरथस्थिता ॥२६
कादंबमधुमत्ताश्च काश्चिदारूढसैंधवाः ।
मंत्रनाथां पुरस्कृत्य संप्रचेलुः पुरः पुरः ॥२७

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