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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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पृष्ठ 576

१६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ही श्रेष्ठ वाणियों के द्वारा स्तुति की थी ।४७। इसके अनन्तर सनातन वासु-
देव भगवान् प्रसन्न हुए थे और इस जगत की रक्षा करने में विशेष संसक्त
प्रभू ने सम्पूर्ण देवों से कहा था ।४८। श्री भगवान् ने कहा—आप लोगों का
उपवृंहण में तेज के ही द्वारा कर दूँगा । अब मेरे द्वारा जो भी कहा जाता
है आप लोगों को वह करना चाहिए ।४९।

ओषधिप्रवराः सर्वाः क्षिपत क्षीरसागरे ।
असुरैरपि संधाय सममेव च तैरिह ॥५०
मंथानं मंदरं कृत्वा कृत्वा योक्त्रं च वासुकिम् ।
मयि स्थिते सहाये तु मथ्यताममृतं सुराः ॥५१
समस्तदानवाश्चापि वक्तव्याः सांत्वपूर्वकम् ।
सामान्यमेव युष्माकमस्माकं च फलं त्विति ॥५२
मथ्यमाने तु दुग्धाब्धौ या समुत्पद्यते सुधा ।
तत्पानाद् बलिनो यूयममर्त्याश्च भविष्यथ ॥५३
यथा दैत्याश्च पीयूषं नैतत्प्राप्स्यंति किंचन ।
केवलं क्लेशवंतश्च करिष्यामि तथा ह्यहम् ॥५४
इति श्रीवासुदेवेन कथिता निखिलाः सुराः ।
संधानं त्वतुलैर्दैत्यैः कृतवंतस्तदा सुराः ।
नानाविधौषधिगणं समानीय सुरासुराः ॥५५
क्षीराब्धिपयसि क्षिप्त्वा चंद्रमोऽधिकनिर्मलम् ।
मन्थानं मंदरं कृत्वा कृत्वा योक्त्रं तु वासुकिम् ।
प्रारेभिरे प्रयत्नेन मंथितुं यादसां पतिम् ॥५६

इस क्षीर सागर में आप लोग असुरों के भी साथ में सन्धि अर्थात्
मेल-जोल करके सब उनके भी साथ में समस्त परम श्रेष्ठ ओषधियाँ डाल
दो ।५०। और मन्दराचल को मन्थान बनाकर अर्थात् मन्थन करने का साधन
बनाकर तथा वासुकि नामक सर्पराज को योक्त अर्थात् मथने की डोरी
करके सब देवगण मेरे सहायक होने पर अमृत का मथन करो अर्थात् अमृत
निकालो ।५१। सान्त्वना के साथ आपको समस्त दानवों से भी इस कार्य को