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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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हयग्रीव अगस्त्य संवाद ] [ १५१

फल होगा और इनका क्या कैसा भी कोई उपाय भी है ? बृहस्पतिजी ने देवराज के इस वाक्य का श्रवण कर फिर उन्होंने धर्मार्थ के सहित परम शुभ वाक्य में उत्तर दिया था ।३३-३४। हे राजन् ! किये हुए कर्मों का फल सैकड़ों करोड़ कल्पों में भी बिना प्रायश्चित्त और उपभोगों के कभी भी विनाश नहीं होता है ।३५।

इन्द्र उवाच-
कर्म वा कीदृशं ब्रह्मन्प्रायश्चित्तं च कीदृशम् ।
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि तन्मे विस्तरतो वद ॥३६

बृहस्पतिरुवाच-
हननस्तेयहिंसाश्च पानमन्यांगनारतिः ।
कर्म पंचविधं प्राहुर्दुष्कृतं धरणीपतेः ॥३७
ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रगोतुरंगखरोष्ट्रकाः ।
चतुष्पदोऽण्डजाब्जाश्च तिर्यंचोऽनस्थिकास्तथा ॥३८
अयुतं च सहस्रं च शतं दश तथा दश ।
दशपंचत्रिरेकार्धमानुपूर्व्यादिदं भवेत् ॥३६
ब्रह्मक्षत्रविशां स्त्रीणामुक्तार्थे पापमादिशेत् ।
पितृमातृगुरुस्वामिपुत्राणां चैव निष्कृतिः ॥४०
गुर्वाज्ञया कृतं पापं तदाज्ञालंघनेऽर्थकम् ।
दशब्राह्मणभृत्यर्थमेकं हन्याद्द्विजं नृपः ॥४१
शतब्राह्मणभृत्यर्थं ब्राह्मणो ब्राह्मणं तु वा ।
पंचब्रह्मविदामर्थे वैश्यमेकं तु दंडयेत् ॥४२

इन्द्रदेव ने कहा—हे ब्रह्मन् ! वह कर्म किस प्रकार का है और प्रायश्चित्त कैसा है ? वह सब मैं सुनने का इच्छुक हूँ । वह मुझे विस्तार के साथ बतलाइए ।३६। बृहस्पति जी ने कहा—राजा के लिये पाँच तरह के दुष्कृत कहे गये हैं—किसी का हनन करना—स्तेय (चोरी)—हिंसा—मदिरा पान और अन्य अङ्गना के साथ में रति करना ।३७। ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य, शूद्र, गौ--अश्व, गधा, ऊँट, चतुष्पद--अण्डज--अब्ज—तिर्यक्—