संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 549, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ेंअगस्त्य यात्राजनार्दन आविर्भाव ] [ १३६
अगस्त्य यात्रा जनार्दन आविर्भाव
श्रीगणेशाय नमः—
अथ श्रीललितोपाख्यान प्रारभ्यते ।
चतुर्भुंजे चन्द्रकलावर्तंसे कुचोन्नने कुङ्कुमरागशोणे ।
पुण्ड्रेक्षुपाशांकुशपुष्पवाणहस्ते नमस्ते जगदेकमातः ॥१
अस्तु नः श्रेयसे नित्यं वस्तु वामाङ्गसुन्दरम् ।
यतस्तृतीयो विदुषां तृतीयस्तु परं महः ॥२
अगस्त्यो नाम देवर्षिर्वेदवेदाङ्गपारगः ।
सर्वसिद्धान्तसारज्ञो ब्रह्मानन्दरसात्मकः ॥३
चचाराद्भुतहेतूनि तीर्थान्यायतननि च ।
शैलारण्यापगामुख्यान्सर्वाञ्जनपदानपि ॥४
तेषु तेष्वखिलाञ्जंतूनज्ञानतिमिगवृतान् ।
शिश्नोदरपरान्दृष्ट्वा चिन्तयामास तान्प्रति ॥५
तस्य चिन्तयमानस्य चरतो वसुधामिमाम् ।
प्राप्तमासीन्महापुण्यं कांचीनगरमुत्तमम् ॥६
तत्र वारणशैलेन्द्रमेकाग्रनिलयं शिवम् ।
कामाक्षीं कलिदोषघ्नीमपूजयदथात्मवान् ॥७
हे इस जगत् की एक ही जननि ! आपकी सेवा में मेरा सादर प्रणाम निवेदित हैं । आप चार भुजाओं वाली हैं आपके मस्तक में चन्द्रमा की कला का भूषण विद्यमान है—आपके अत्यन्त उन्नत उरोज हैं-आपका वर्ण कुंकुम के राग के सदृश रक्त है—पुण्ड्र-इक्षु, पाश-अंकुश और पुष्पों का वाण आपके करों में सुशोभित है ।१। आपके वाम अङ्ग में परम सुन्दर वस्तु हमारे नित्य ही कल्याण के लिए होवे । जिससे विद्वानों में तीसरे और तृतीय परम तेज विद्यमान है ।२। वह अगस्त्य नाम वाले देवर्षि हैं जो वेदों और वेदाङ्ग शास्त्रों के पारगामी विद्वान् हैं । वे सब सिद्धान्तों के सार के ज्ञाता हैं और ब्रह्मानन्द के रस के ही स्वरूप वाले हैं ।३। अद्भुतता के हेतु स्वरूप तीर्थों का और पवित्र आयतनों का जिन्होंने सञ्चरण किया था