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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 544

१३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

परम पुण्यलोक को प्राप्त करके इस प्रकार से आनन्दित हो रहे हैं ।४०। ये वे
भी नैमिषेय अर्थात् नैमिष क्षेत्र में रहने वाले सभी देखकर को और स्पर्श
करके उस समय में अवभृथ स्नान किये हुए सबके सब स्वर्गलोक को गमन
कर गये थे ।४१। हे विप्रो ! उसी प्रकार से आप लोगों ने भी बहुत प्रकार
के यज्ञों के द्वारा यजन किया है। हे उत्तम द्विजगणो ! फिर जब आपकी
आयु का अवसान होगा तब आप भी सब स्वर्ग में गमन कर जांयगे ।४२।

प्रक्रिया प्रथमः पादः कथायास्तु परिग्रहः ।
अनुषंग उपोद्घात उपसंहार एव च ॥४३
एवमेव चतुः पादं पुराणं लोकसम्मतम् ।
उवाच भगवात्साक्षाद्वायुर्लोकहिते रतः ॥४४
नैमिषे सत्रमासाद्य मुनिभ्यो मुनिसत्तम ।
तत्प्रसादं च संसिद्धं भूतोत्पत्तिलयान्वितम् ॥४५
प्राधानिकीमिमां सृष्टिं तथैवेश्वरकारिताम् ।
सम्यग्विदित्वा मेधावी न मोहमधिगच्छति ॥४६
इदं यो ब्राह्मणो विद्वानितिहासं पुरातनम् ।
शृणुयाच्छ्रावयेद्वापि तथाऽध्यापयतेऽपि च ॥४७
स्थानेषु स महैंद्रस्य मोदते शाश्वतीः समाः ।
ब्रह्मसायुज्यगो भूत्वा ब्रह्मणा सह मोदते ॥४८
तेषां कीर्तिमतां कीर्ति प्रजेशानां महात्मनाम् ।
प्रथयन्पृथिवीशानां ब्रह्मभूयाय गच्छति ॥४९

इस महा पुराण में चार पाद हैं—सर्व प्रथम प्रक्रिया है जो कि प्रथम
पाद है—फिर कथा का परिग्रह है । फिर अनुष्वंग है और अन्त में उपो-
द्घात तथा उपसंहार है ।४३। इसी रीति से चार पादों वाला यह पुराण लोक
सम्मत है । इस पुराण को लोकों के हित में रति रखने वाले भगवान् वायु
देव ने ही साक्षात् रूप से इसको कहा है ।४४। हे श्रेष्ठतम मुने ! नैमिष क्षेत्र
में एक सत्र (यज्ञ) को प्राप्त करके मुनिगण एकत्रित हुए थे तभी उनसे कहा
उसका प्रसाद संसिद्ध हो गया जो भूतों की उत्पत्ति और तप से संयुत है
।४५। इस प्राधिनिकी अर्थात् प्रधान के द्वारा की हुई तथा ईश्वर के द्वारा