संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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एवं तानभिमानेन प्रपत्स्यति पुनस्तदा ।
यदा प्रवर्त्तितव्यं तु क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्द्वयोः ॥१६
भोज्यभोक्तृत्वसंबंधाः प्रपत्स्यंते च तावुभौ ।
तस्मादक्षरमव्यक्तं साम्ये स्थित्वा गुणात्मकम् ॥१७
क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं तत्र वैषम्यं भजते तु तत् ।
ततः प्रपत्स्यते व्यक्तं क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्द्वयोः ॥१८
क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं सत्त्वं विकारं जनयिष्यति ।
महदाद्यं विशेषांतं चतुर्विंशगुणात्मकम् ॥१६
क्षेत्रज्ञस्य प्रधानस्य पुरुषस्य प्रवर्त्स्यतः ।
आदिदेवः प्रधानस्यानुग्रहाय प्रचक्षते ॥२०
अनाद्यौ बपमुत्पादौ उभौ सूक्ष्मौ तु तौ स्मृतौ ।
अनादिसंयोगयुक्तौ सर्वं क्षेत्रज्ञमेव च ॥२१
यह सभी कार्य बुद्धिपूर्वक प्रधान का ही होगा। यह क्षेत्रज्ञ अबुद्धिपूर्वक उन गुणों में अधिष्ठित होगा ।१५। इस प्रकार से उस समय में फिर अभिमान के साथ उनको प्राप्त होगा । जिस समय में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ इन दोनों का प्रवृत्त होना चाहिए ।१६। वे दोनों ही को भोज्य और भोक्तृत्व के सम्बन्ध प्राप्त होंगे । इससे गुणात्मक अक्षर अव्यक्त समता में स्थित होता है ।१७। वहाँ पर वह क्षेत्रत्र में अधिष्ठित विषमता को प्राप्त होता है । फिर दोनों क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को व्यक्त प्राप्त होगा ।१८। क्षेत्रज्ञ में अधिष्ठित सत्व विकार को उत्पन्न कर देगा । वह विकार महत् तत्व से लेकर विशेष के अन्त तक चौबीस गुणों के स्वरूप वाला है ।१६। क्षेत्रज्ञ का प्रधान का और पुरुष का प्रवृत्त होंगे । जो आदि देव हैं वे प्रधान के ही ऊपर अनुग्रह करने वाले कहे जाते हैं । वे दोनों अनादि और श्रेष्ठ उत्पाद तथा सूक्ष्म कहे गये हैं ।२०-२१।
अबुद्धिपूर्वकं युक्तमशक्तौ तु वरौ तदा ।
अप्रत्ययममोघं च स्थितावुदकमत्स्यवत् ॥२२
प्रवृत्तपूर्वौ तौ पूर्वं पुनः सर्वं प्रपत्स्यते ।
अज्ञा गुणैः प्रवर्त्तन्ते रजःसत्त्वतमोऽभिधैः ॥२३