संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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उस जल को अपने ही स्वरूप ले लेता है ।११। धीरे-धीरे यह सब जगत् अग्नि (तेज) की ज्वालाओं से सम्पूरित हो जाता है । वे सब अर्चियाँ ऊपर-नीचे और तिरछी और सर्वत्र व्याप्त हो जाती हैं ।१२। इस तेज का विशेष गुण रूप होता है जो कि इसका प्रकाश करने वाला है । इस रूप को वायु भक्षण कर जाता है । उस समय में वह तेज की ज्वालाओं वायु में दीप की शिखा के ही समान प्रलीन हो जाया करती है । जब रूप की तन्मात्रा विनष्ट हो जाती है तो वह अग्नि रूप से रहित हो जाता है । तेज तो फिर उपशान्त हो जाता है और केवल वायु ही महान् स्वरूप को धारण करके धूम धाम से सर्वत्र वहन किया करता है ।१३-१४।
निरालोके तदा लोके वायुभूते च तेजसि ।
ततस्तु मूलमासाद्य वायुः संबंधमात्मनः ।।१५
ऊर्ध्वं चाधश्च तिर्यक्च दोधवीति दिशो दश ।
वायोरपि गुणं स्पर्शमाकाशं ग्रसते च तत् ।।१६
प्रशाम्यति तदा वायुः खं तु निष्ट्यनावृतम् ।
अरूपमरसस्पर्शमगन्धं न च मूर्तिमत् ।।१७
सर्वमापूरयञ्छब्दैः सुमहत्तत्प्रकाशते ।
तस्मिँल्लीने तदा शिष्टमाकाशं शब्दलक्षणम् ।।१८
शब्दमात्रं तदाऽकाशं सर्वमावृत्य तिष्ठति ।
तत्र शब्दं गुणं तस्य भूतादिर्ग्रसते पुनः ।।१६
भूतेंद्रियेषु युगपद्भूतादौ संस्थितेषु वै ।
अभिमानात्मको ह्येष भूतादिस्तामसः स्मृतः ।।२०
भूतादिग्रंसते चापि महान्वै बुद्धिलक्षणः ।
महानात्मा तु विज्ञेयः संकल्पो व्यवसायकः ।।२१
तेज को जब वायु ने ग्रस लिया था तो प्रकाशक रूप के अभाव होने से लोक में आलोक सर्वथा नहीं रहा था क्योंकि तेज तो वायु के ही रूप में लीन हो गया था । इसके पश्चात् वायु अपने सम्बन्ध भूत को प्राप्त करके ।१५। वह वायु ऊपर नीचे और इधर-उधर सर्वत्र दश दिशाओं में प्रकम्पित किया करता है । इस वायु का विशेष गुण स्पर्श होता है उस स्पर्श को