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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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पृष्ठ 494

आभूत संप्लव वर्णन ] [ ८१

यह मेरा पुत्र है—ऐसा ही कह रहे थे । फिर उन्होंने आपस में कहा था कि ये अभिध्यान से आत्मा से ही समुत्पन्न हैं ।४५-४६। अतएव जो भी जिसके शरीर के तुल्य हो वह उसी को अपना सुत मान लेवे । जो भी जिसके रूप-वीर्य और मात में सदृश होवे अथवा वर्ण से जो जिसके समान हो उसी को वह ग्रहण कर लेवे—इसी में आप का कल्याण है । यह तो निश्चित ही है कि पुत्र पिता के रूप को सर्वदा ग्रहण किया करता है ।४७-४८। इसलिए पिता और माता के वीर्य से पुत्र सदा आत्मा के ही समान हुआ करता है । उस प्रकार से उन्होंने समझौता करके सब सुतों का ग्रहण किया था ।४९।

चाक्षुषस्यांतरेऽतीते प्राप्ते वैवस्वतस्य ह ।
रुचेः प्रजापतेः पुत्रो रौच्यो नामाभवत्सुतः ॥५०
भूत्यामुत्पादितो यस्तु भौत्यो नाम कवेः सुतः ।
वैवस्वतेऽन्तरे जातो द्वौ मनू तु विवस्वतः ॥५१
वैवस्वतो मनुर्यश्च सावर्णो यश्च वै श्रुतः ।
ज्ञेयः संज्ञासुतो विद्वान्मनुर्वैवस्वतः प्रभुः ॥५२
सवर्णयाः सुतश्चान्यः स्मृतो वैवस्वतो मनुः ।
सावर्णमनवो ये च चत्वारस्तु महर्षिजाः ॥५३
तपसा संभृतात्मानः स्वेषु मन्वन्तरेषु वै ।
भविष्येषु भविष्यन्ति सर्वकार्यार्थसाधकाः ॥५४
प्रथमे मेरुसावर्णेर्दक्षपुत्रस्य वै मनोः ।
परामरीचिगर्भाश्च सुधर्माणश्च ते वयः ।
संभूताश्च महात्मानः सर्वे वैवस्वतेऽन्तरे ॥५५
दक्षपुत्रस्य पुत्रास्ते रोहितस्य प्रजापतेः ।
भविष्यन्ति भविष्यास्तु एकैको द्वादशो गणः ॥५६

चाक्षुष मन्वन्तर के व्यतीत हो जाने पर और वैवस्त मन्वन्तर के सम्प्राप्त होने पर प्रजापति का रुचि से एक पुत्र उत्पन्न हुआ था जिसका नाम रौच्य हुआ था ।५०। जो भूति के गर्भ से उत्पन्न किया गया था उस पुत्र का नाम भौत्य हुआ था और यह कवि का पुत्र था । वैवस्वत मन्वन्तर