संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 448, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ेंसगर विनाश वर्णन ] [ ३५
में लगी हुई अग्नि के ही समान तुरन्त ही एक ही साथ विलय को प्राप्त हो गये हैं मानों हुए हो नहीं थे। आप उनका नाम मात्र ही रह गया है ॥४२॥
उद्वेजनीया भूतानां सद्भिभरत्यंतगर्हिताः ।
आजीवांतमिमे हर्तुं दिष्ट्या संक्षयमागताः ॥४३
परोपतापि नितरां सर्वलोकजुगुप्सितम् ।
इह कृत्वाऽशुभं कर्म कः पुमान्विन्दते सुखम् ॥४४
विक्रोश्य सर्वभूतानि संप्रयाताः स्वकर्मभिः ।
ब्रह्मदंडहताः पापा निरयं शाश्वतीः समाः ॥४५
तस्मात्सदेव कर्त्तव्यं कर्म पुंसां मनीषिणाम् ।
दूरतंश्च परित्याज्यमितरल्लोकनिन्दितम् ॥४६
कर्त्तव्यः श्रेयसे यत्नो यावज्जीवं विजानता ।
नाचरेत्कस्यचिद्द्रोहमनित्यं जीवनं यतः ॥४७
अनित्योऽयं सदा देहः संपदश्चातिचंचलाः ।
संसारश्चातिनिस्सारस्तत्कथं विश्वसेद्बुधः ॥४८
एवं सुरमुनीन्द्रेषु कथयत्सु परस्परम् ।
मुनिक्रोधैधनीभूता विनेशुः सगरात्मजाः ॥४९
निर्दग्धदेहाः सहसा भुवं विष्टभ्य भस्मना ।
अवापुर्निरयं सद्यः सागरास्ते स्वकर्मभिः ॥५०
सागरांस्तानशेषेण दग्ध्वा क्रोधजोऽनलः ।
क्षणेन लोकानखिलानुद्यतो दग्धुमंजसा ॥५१
भयभीतास्ततो देवाः समेत्य दिवि संस्थिताः ।
तुष्टुवुस्ते महात्मानं क्रोधाग्निशमनार्थिनः ॥५२
ये सभी प्राणियों के लिए उद्वेग करने वाले थे और सत्पुरुषों के द्वारा बहुत ही निन्दित समझे जाया करते थे । ये जीवन जब तक इनका रहा सबका अपहरण ही किया करते थे । अब बहुत ही अच्छा हुआ कि सबके सब विनाश को प्राप्त हो गये हैं । यह तो एक प्रसन्नता की ही बात हुई है ।