संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
शत्रुओं के विनिग्रह करने में कैसे असमर्थ हो सकता हूँ ।१-२। आप तो मेरे
गुरुदेव हैं— सुहृत्-दैव-बन्धु और मित्र हैं। केवल आप ही मेरे सब कुछ हैं।
मैं तो आपके अतिरिक्त अन्य किसी को भी मेरा पिता नहीं जानता हूँ ।३।
आपके द्वारा उपदेश किये गये अस्त्र से ही मैंने सब नृपों पर विजय प्राप्त
की है जिनके स्मरण से ही पूर्ण विजय मेरी हुई है यह आपके ही तप की
शक्ति है। यहाँ पर उसका एक देश भी विस्मय देने वाला दिखलाई देता
है ।४-६। देखिये, मृग का शिशु बचपन से ही सिंहासन पर समीप में आकर
हे ब्रह्मन् ! धीरे-धीरे जल पी रहा है और वह आपके इस तपोवन में
बिल्कुल ही निःशङ्क अर्थात् भय से रहित है ।७।
धयत्यतिविश्रम्भात् कृशाऽपि हरिणीस्तनम् ।
करोति मृगशृंगाग्रे गंडकंडूयनं रुरुः ॥८
नवप्रसूतां हरिणीं हत्वा वृत्त्यै वनांतरे ।
व्याघ्री त्वत्तसावासे सैव पुष्णाति तच्छिशून् ॥९
गजं द्रुतमनुद्रुत्य सिंहो यस्मादिदं वनम् ।
प्रविष्टोऽनुसरंतौ त्वद्भयादेकत्र तिष्ठतः ॥१०
नकुलस्त्वाखुमार्जारमयूरशशपन्नगाः ।
वृकसूकरशार्दूलशरभर्क्षप्लवंगमाः ॥११
श्रृगाला गवया गावो हरिणा महिषास्तथा ।
वनेऽत्र सहजं वैरं हित्वा मैत्रीमुपागताः ॥१२
एवंविधा तपः शक्तिर्लोकविस्मयदायिनी ।
न क्वापि दृश्यते ब्रह्मंस्त्वामृते भुवि दुर्लभा ॥१३
अहं तु त्वत्प्रसादेन विजित्य वसुधामिमाम् ।
रिपुभिः सह विप्रर्षे स्वराज्यं समुपागतः ॥१४
वह अत्यन्त दुबली हरिणी भी अत्यधिक विश्राम के साथ अपने स्तन
को पिला रही है। हरिण मृग छोना के गण्डों को शृङ्ग के अग्रभाग से
खुजला रहा है ।८। नव प्रसूता अर्थात् हाल ही में प्रसव करने वाली हरिणी
को मारकर वृत्ति के लिए दूसरे वन में वही व्याघ्री आप के इस तपस्या के
आश्रम में उसके शिशुओं के पोषण कर रही है ।९। एक सिंह एक हाथी के