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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 318, कुल 893 में से

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पृष्ठ 318

३२२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

नेत्रों से उन दोनों अस्त्रों का पान कर लिया था ।३२। जगत के कल्याण का विचार करके ही उनका पान किया और फिर महान आत्मा वाले उनने क्षण भर के लिए ध्यान में अवस्थित होकर चुपचाप वे खड़े रह गये थे । इसके उपरान्त उनके ध्यान के प्रबल प्रभाव से वे दोनों ही ब्रह्मास्त्र प्रभाव हीन हो गये थे ।३३। फिर इसके अनन्तर वह दोनों अस्त्रों का जोड़ा भूमि पर गिर गया था ।३४। वह परशुराम तो महान पुरुषों में भी परम महान थे और इस संसार के सृजन-पालन और निहंतन करने में पूर्ण समर्थ थे । ।३४। वे साक्षात् विभु थे तो भी अपने वास्तविक प्रभाव को छिपाने के ही लिए इस लौकिक विधान को किया करते थे जिससे लोग उनके असली स्वरूप को न पहिचान पावें । वह ऐसा ही सबकी दृष्टि में दर्शित किया करते थे कि वे बड़े धनुर्धारी-विशिष्टशूर-तेजस्वी-सभा में प्रमुख और संसद में तथ्य के बोलने वाले हैं ।३५।

कलाकलापेषु कृतप्रयत्नो विद्यासु शास्त्रेषु बुधो विधिज्ञः
एवं नृलोके प्रथयन्स्वभावं सर्वाणि कल्यानि
करोति नित्यम् ।।३६

सर्वे तु लोका विजितास्तु तेन रामेण राजन्यनिषूदनेन ।
एवं स शमः प्रथित प्रभावः प्रशामयित्वा तु तदस्त्रयुग्मम् ।।३७

पुनः प्रवृत्तो निधनं प्रकर्तुं रणांगणे हैहयवंशकेतोः ।
तूणीरतः पत्रियुगं गृहीत्वा पुंखे निधायाथ धनुर्ज्यकायाम् ।।३८

आलक्ष्य लक्ष्यं नृपकर्णयुग्मं चकर्त्तचूडामणिहर्तुकामः ।
स कृत्तकर्णो नृपतिर्महात्मा विनिर्जिताशेषजगत्प्रवीरः ।।३६

मेने निजं वीर्यमिह प्रणष्टं रामेण भूमीश तिरस्कृतात्मा ।
क्षणं धराधीशतनुर्विवर्णा गतानुभावा नृपतेर्बभूव ।।४०

लेख्येष सञ्चित्रकरप्रयुक्ता सुदीनचित्तस्य विलक्ष्यतेंऽग ।

ततः स राजा निजवीर्यवैभवं समस्तलोकाधिकतां
प्रयातम् ।।४१

विचित्य पौलस्त्यजयादिलब्धं शोचन्निवासीत्स
जयाभिकांक्षी ।
दध्यौ पुनर्मीलितलोचनो नृपो दत्तं तमात्रेयकुलप्रदीपम् ।।४२

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