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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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भार्गव-चरित्र (२) । [ २६७

दान देने वाली हो जाइए । इस प्रकार से अभ्यर्थना करते हुए उस परशुराम ने पापों के विनाश कर देने वाली नर्मदा के लिए नमस्कार की थी ।७।

दूतं प्रस्थापयामास कार्त्तवीर्यार्जुनं प्रति ।
दूत राजा त्वया वाच्यो यदहं वच्मि तेऽनघ ॥८
न संदेहस्त्वया कार्यो दूतः क्वापि न वध्यते ।
यद्बलं तु समाश्रित्य जमदग्निमुनिं नृपः ॥९
तिरस्त्वं कृतवान्मूढ तत्पुत्रो योद्धुमागतः ।
शीघ्रं निर्गच्छ मंदात्मन्युद्धं रामाय देहि तत् ॥१०
भार्गवं त्वं समासाद्य गच्छ लोकांतरं त्वरा ।
इत्येवमुक्त्वा राजानं श्रुत्वा तस्य वचस्तथा ॥११
शीघ्रमागच्छ भद्रं ते विलम्बो नेह शस्यते ।
तेनैवमुक्तो दूतस्तु गतो हैहयभूपतिम् ॥१२
रामोदितां तत्सकलं श्रावयामास संसदि ।
स राजात्रेयभक्तस्तु महाबलपराक्रमः ॥१३
चुक्रोध श्रुत्वा वाच्यं तद्दूतमुत्तरमावहत् ।
कार्त्तवीर्य उवाच—
मया भुजबलेनैव दत्तदत्तेन मेदिनी ॥१४

उसके अनन्तर वहीं से एक दूत को कार्त्तवीर्यार्जुन के राजा के पास भेजा था । उन्होंने उस दूत से कहा था कि हे दूत ! तुमको वहाँ पहुँच कर उस राजा कार्त्तवीर्य से यह कहना चाहिए हे अनघ ! अर्थात् निष्पाप ! जो कुछ भी मैं इस समय में तुमको बोल रहा हूँ ।८। ऐसे कहने में तुमको डरना नहीं चाहिए और अपने लिये पाये जाने वाले किसी तरह के दण्ड का हृदय में कुछ भी सन्देह नहीं करना चाहिए क्योंकि राजाओं के यहाँ पर ऐसा नियम है कि जो दूत बनकर आता है वह चाहे कैसी ही सूचना लेकर क्यों न आया हो उसका वध किसी भी दशा में कहीं पर भी नहीं किया जाता है । उस राजा से तुम कह देना कि हे नृप ! जिस बल का समाश्रय लेकर तू ने जमदग्नि महामुनि का महान् तिरस्कार किया था हे मूढ़ ! उसी मुनि का पुत्र तुझसे युद्ध करके बदला लेने के लिए समागत हुआ है । हे मन्द