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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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मृगमृगी कथा ] [ २६१

योऽयं संदृश्यते चास्य पार्श्वे शिष्योऽकृतव्रणः ।
स चानेन मताभागस्त्रातो व्याघ्रभयातुरः ॥२९॥
अयं रामो महाभागे जमदग्निसुतोऽनुजः ।
पितरं कार्त्तवीर्येण दृष्ट्वा चैव तिरस्कृतम् ॥३०॥
चकारातितरां क्रुद्धः प्रतिज्ञां नृपघातिनीम् ।
तत्पूर्तिकामो ह्यगद्ब्रह्मलोकं पुरा ह्ययम् ॥३१॥
स ब्रह्मा दिष्टवांश्चैनं शिवलोकं व्रजेति ह ।
तस्य त्वाज्ञां समादाय गतोऽसौ शिवसन्निधिम् ॥३२॥
प्रोवाचाखिलवृत्तांतं राज्ञश्चाप्यात्मनः पितुः ।
स कृपालुर्महादेवः सभाज्य भृगुनन्दनम् ॥३३॥
ददौ कृष्णस्य सन्मंत्रमभेद्यं कवचं तथा ।
स्वीयं पाशुपतं चास्त्रमन्यास्त्रग्राममेव च ॥३४॥
विसर्जयामास मुदा दत्त्वा शस्त्राणि चादरात् ।
सोऽयमत्रागतो भद्रे मंत्रसाधनतत्परः ॥३५॥

जो इस महापुरुष के समीप में अकृतव्रण नाम वाला एक शिष्य दिखाई दे रहा है उसको इसी महापुरुष ने ही व्याघ्र के भय से जब यह आतुर हो गया तो इसकी व्याघ्र से सुरक्षा की थी ।२६। हे महाभागे ! यह राम है जो जमदग्नि मुनि का पुत्र है । इसने ही अपने पिता को राजा कार्तवीर्य के द्वारा निराकृत किया हुआ देखा था और उस समय में इसने अत्यन्त क्रुद्ध होकर नृपों के विघात करने की प्रतिज्ञा की थी और उस प्रतिज्ञा की पूर्त्ति की कामना वाला यह पहिले ब्रह्म लोक में गया था ।३०-३१। वहाँ पर इसको यह निर्देश किया था कि यह शिवलोक में चला जावे । उन ब्रह्माजी की आज्ञा को प्राप्त करके फिर यह राम भगवान् शिव की सन्निधि में प्राप्त करके फिर यह राम भगवान् शिव की सन्निधि में प्राप्त हुआ ।३२। और वहाँ पर इसने भगवान् शम्भु के समक्ष राजा का, पिता का और अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त निवेदित किया था । वे महादेव बहुत ही कृपालु थे उन्होंने इस भृगुनन्दन का स्वागत किया था ।३३। फिर उन शङ्कर प्रभु ने श्रीकृष्ण का एक उत्तम मन्त्र और न भेदन करने के योग्य एक कवच इसको