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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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परशुराम का शिव लोक गमन ] [ २४१

करिष्यसि यथा भावि नैवान्यथा भवेत् ॥१८
इतो व्रज त्वं ब्रह्माणं पृच्छ तात हिताहितम् ।
स यद्वदिष्यति विभुस्तत्कर्त्ता नात्र संशयः ॥१९
वसिष्ठ उवाच-
एवमुक्तः स पितरं नमस्कृत्य महामतिः ।
जगाम ब्रह्मणो लोकमगम्यं प्राकृतैर्जनैः ॥२०
ददर्श ब्रह्मणो लोकं शातकौम्भवनिर्मितम् ।
स्वर्णप्राकारसंयुक्तं मणिस्तम्भैर्विभूषितम् ॥२१

परशुराम ने कहा-हे महाप्राज्ञ तात ! अब आप मेरी विज्ञप्ति का श्रवण कीजिए । आपने जो शाम बतलाया है वह महान आत्मा वाले साधु पुरुषों का है । वह शाम साधु पुरुषों के प्रति-दीनजनों पर और ईश्वर की भावना से संयुत गुरुजनों में ही करना चाहिए । जो दुष्टजन हैं उनमें किया हुआ शाम कभी भी सुख देने वाला नहीं हुआ करता है ।१५-१६। इसी कारण से इस दुष्ट कार्त्तवीर्य का वध तो मेरे द्वारा करने के ही योग्य है । हे सम्मान करने के योग्य ! आज तो आप मुझे अपनी आज्ञा प्रदान कर दीजिए कि मैं अपने बैर का बदला ले लूँ ।१७। जमदग्नि मुनि ने कहा—हे महाभाग राम ! अब आप बहुत सावधान होकर मेरे वचन का श्रवण करो । यह मैं जानता हूँ कि जो कुछ होने वाला है उसे ही तुम अवश्य करोगे । इसमें कुछ भी अन्यथा नहीं होगा ।१८। अब आप यहाँ से ब्रह्माजी के समीप में चले जाओ और उनसे हे तात ! अपना हित और अहित पूछिए । वे विभु जो भी कहेंगे उसी को आप करना—फिर इसमें कुछ भी संशय नहीं होगा ।१९। वसिष्ठ जी ने कहा—जब राम के पिता के द्वारा इस प्रकार से राम से कहा गया था तो उस महामति ने अपने पिता के चरणों में प्रणाम किया था और फिर वह ब्रह्माजी के लोक को चला गया था जो लोक सामान्य प्राकृतजनों के द्वारा गमन करने के योग्य नहीं था ।२०। उस परशु-राम ने ब्रह्माजी के उस लोक को देखा था जो लोक सुवर्ण के ही द्वारा बना हुआ था । उस लोक का प्राकार (चहार दीवारी) भी सुवर्ण से संयुत था था और वह लोक मणियों के अनेक स्तम्भों से विभूषित हो रहा था ।२१।

तत्रापश्यत्समासीनं ब्रह्माणममितौजसम् ।
रत्नसिंहासने रम्ये रत्नभूषणभूषितम् ॥२२