सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 209

कार्तिकेय द्वारा कामधेनु की मांग ] [ २१३

आपका राज्य और पुरी तो परम सुरक्षित है अतः वहां पर पुरी में गमन करने से क्या फल होगा ? अर्थात् इसी समय वहाँ गमन व्यर्थ ही है ।३२। हे प्रभो ! यह रत्नभूता गो जब तक आप सरीखे राजा के घर में न होवे तब तक आपका सम्पूर्ण राज्य इसके वैभव के सामने आधा भी नहीं है और यों ही कहना उचित है कि आपका पूरा राज्य एक प्रकार से शून्य हीं है ।३३। हे राजन् ! मैंने एक और भी महान् आश्चर्य देखा था, उसका भी आप श्रवण कीजिए । उस धेनु ने अपनी अद्भुत शक्ति से बड़े-बड़े मनोज्ञ भवन समुत्पादित किये थे वे सब और परम सुन्दरी स्त्रियाँ जो थीं तथा अनेक भाँति के आकार-प्रकार वाले जो महल अर्थात् विशाल भवन थे एवं जो कभी भी क्षीण होने वाला नहीं देखा गया था वह धन सभी कुछ एक ही क्षण में उसी धेनु में मेरे देखते-देखते विलीन हो गये थे ।३४-३५।

तत्तपोवनमेवासीदिदानीं राजसत्तम ।
एवंप्रभावा सा यस्य तस्य किं दुर्लभं भवेत् ॥३६
तस्माद्रत्नार्हसत्त्वेन स्वीकर्त्तव्या हि गौस्त्वया ।
यदि तेऽनुमतं कृत्यमाख्येयमनुजीविभिः ॥३७
राजोवाच—एवमेवाहमप्येनां न जानामीत्यसांप्रतम् ।
ब्रह्मस्वं नापहर्त्तव्यमिति मे शङ्कते मनः ॥३८
एवं ब्रुवंतं राजानमिदमाह पुरोहितः ।
गर्गो मतिमतां श्रेष्ठो गर्हयन्निव भूपते ॥३९
ब्रह्मस्वं नापहर्त्तव्यमापद्यपि कथंचन ।
ब्रह्मस्वसदृशं लोके दुर्जरं नेह विद्यते ॥४०
विषं हंत्युपयोक्तारं लक्ष्यभूतं तु हैहय ।
कुलं समूलं दहति ब्रह्मस्वारणिपावकः ॥४१
अनिवार्यमिदं लोके ब्रह्मस्वं दुर्जरं विषम् ।
पुत्रपौत्रान्तफलदं विपाककटु पार्थिव ॥४२

हे श्रेष्ठ राजन् ! इस समय में वही तपोवन था जिसमें इस रीति के प्रभाव वाली वह धेनु विद्यमान है । उस व्यक्ति को इस जगत् में क्या पदार्थ दुर्लभ है अर्थात् उस को कुछ भी दुर्लभ नहीं होता है ।३६। इस कारण से आप तो सभी रत्नों के रखने के योग्य बल-विक्रम वाले हैं । आपको यह गौ