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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२१२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

समस्त इच्छाओं की पूर्ति करने वाली धेनुओं से भी परमश्रेष्ठ धेनु प्राप्त की
है। इस मेरे सम्पूर्ण राज्य के महान् वैभव से भी क्या हो सकता है और
अनल्प योग की ऋद्धि से भी कुछ नहीं हो सकता है। अर्थात् इस मेरे महान्
विशाल राज्य का वैभव तथा योग द्वारा ऋद्धि का वैभव भी इसके सामने
तुच्छ है ।२८।

गोरत्नभूता यदिदं धेनुर्मु निवरे स्थिता ।
अनयोत्पादिता नूनं संपत्स्वर्गसदामपि ॥२६
ऋद्धमैन्द्रमपि व्यक्तं पदं त्रैलोक्यपूजितम् ।
अस्या धेनोरहं मन्ये कलां नार्हति षोडशीम् ॥३०
इत्येवं चिंतयानं तं पश्चादभ्येत्य पार्थिवम् ।
चन्द्रगुप्तोऽब्रवीन्मंत्री कृतांजलिपुटस्तदा ॥३१
किमर्थं राजशार्दूल पुरीं तिगमिष्यसि ।
रक्षितेन च राज्येन पुर्या वा कि फलं तव ॥३२
गोरत्नभूता नृपतेर्याविद्ध नूनं चालये ।
वर्त्तते नार्द्धमपि ते राज्यं शून्यं तव प्रभो ॥३३
अन्यच्च दृष्टमाश्चर्यं मया राजञ्छृणुष्व तत् ।
भवनानि मनोज्ञानि मनोज्ञाश्च तथा स्त्रियः ॥३४
प्रसादा विविधाकारा धनं चादृष्टसंक्षयम् ।
धेनो तस्यां क्षणेनैव विलीनं पश्यतो मम ॥३५

कारण यही है कि समस्त धेनुओं में रत्न के सदृश यह धेनु इस
मुनिवर के समीप में संस्थित है। इसके ही द्वारा स्वर्ग में निवास करने
वालों की भी सम्पदा उत्पादित की गयी है यह निश्चित है ।२६। यह माना
जाता है कि महेन्द्र का पद अर्थात् स्थान परम ऋद्धियों से परिपूर्ण है तथा
यह तीनों लोकों में पूजित होता है क्योंकि सर्वतोभाव से यह परम समृद्ध
होता है किन्तु मैं तो ऐसा मानता हूँ कि वह इन्द्र का वैभव भी इस धेनु की
शक्ति से समुत्पादित वैभव के सामने सोलहवाँ भाग भी नहीं है ।३०। राजा
इसी प्रकार से अपने मन में चिन्तन कर रहा था उस राजा के पीछे से आकर
मन्त्री चन्द्रगुप्त ने उस समय में हाथ जोड़कर उस राजा से कहा था ।३१।
हे राज शार्दूल ! आप किस लिए अपनी पूरी की ओर गमन कर रहे हैं ?