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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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जमदग्नि द्वारा अतिथि सत्कार ] [ १६६

सर्वर्त्तुकप्रवरसौरभवायुमंदमंदप्रचारिगतिभर्त्सितघर्मकालम् ।
इत्थं सुरासुरमनोरमभोगसंपद्विस्पष्टमानविभवं नगरं
नरेंद्र ॥१९॥
सौभाग्यभोगममितं मुनिहोमधेनुः सद्यो विधाय
विनिवेदयदाशु तस्मै ।
ज्ञात्वा ततो मुनिवरो द्विजहोमधेन्वा संपादितं नरपते
रुचिरातिथेयम् ॥२०॥
आहूय कंचन तदंतिकमात्मशिष्यं प्रास्थापयत्सगुण-
शालिनमाशु राजन् ।
गत्वा विशामधिपतेस्तरसा समीपं सप्रश्रयं मुनिसुतस्तमिदं
बभाषे ॥२१॥

उस सुरम्य नगर में बहुत ही मूल्यवान् रत्नों से उज्ज्वल एवं समुन्नत गोपुर बने हुए थे तथा श्वा-गृद्धों के समुदायों के बर्त्तन के आलय बने हुए थे। उसमें विचित्र ध्वजाएँ-पताकाएं और शुभ्र पटों से संयुत उन्नत मण्डपिकाएँ विनिर्मित थी ।१५। उस नगर में जल में भरे हुए अनेक तालाब-बावड़ी और सरोवर थे जिनमें अनेक प्रकार की रमणीक ध्वनि हो रही थी तथा वहाँ पर उनका जल कह्लार-कमल-कुमुद और उत्पलों की रेणु से सुवासित था और चक्रवाक-हंस-कुररी-बगुला तथा सारसों की ध्वनियां सुनाई दे रही थीं ।१६। उस नगर में अनेक प्रकार के वृक्ष लगे हुए थे जिनके आलवाल भी बने हुए थे । उन तरुवरों में आम्र-प्रियालपन-मधूक जम्बू और प्लक्ष के वृक्ष थे । वहाँ पर पर्वतों में परम सुन्दर नाग केतुकी पुन्नाग और चम्पक के वन थे जो पक्षियों के द्वारा सेवित थे अर्थात् जिन पर अनेक पक्षी निवास कर रहे थे ।१७। वह नगर अनेक तरह के वृक्षों से शोभित था जिनका स्वरूप जगत् परमाश्चर्य जनक था। वहाँ पर सुसंरक्षित चारों ओर उपवनों की पंक्तियाँ थीं एवं वहाँ अनेक मन्दार-कुन्द-करवीर-सुन्दर यूथिका और जाती आदि के पुष्पों तथा फलों वाले वृक्ष लगे हुए थे ।१८। हे नरेन्द्र ! उस नगर में समस्त ऋतुओं में श्रेष्ठ वसन्त में सुरभित वायु के मन्द-मन्द प्रचलन से घर्म के काल को भर्त्सित कर दिया गया था । इस प्रकार से वह नगर सुरासुरों की परम मनोरम भोगों की सम्पदा के