संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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॥ जमदग्नि द्वारा अतिथि सत्कार ॥
वसिष्ठ उवाच—
तस्मिन्पुरे सन्तुलितामरेंद्रपुरीप्रभावे मुनिवर्यधेनुः ।
विनिर्यमे तेषु गृहेषु पश्चात्तद्योग्यनारीनरवृंदजातम् ॥१
विचित्रवेषाभरणप्रसूनगंधांशुकालंकृतविग्रहाभिः ।
सहावभावाभिरुदारचेष्टाश्रीकांतिसौंदर्यगुणान्विताभिः ॥२
मंदस्फुरद्दन्तमरीचिजालविद्योतिताननसरोजजितेंदुभाभिः ।
प्रत्यग्रयौवनभरासववल्गुगीभिः संमंथरकटाक्ष
निरीक्षणाभिः ॥३
प्रीतिप्रसन्नहृदयाभिरतिप्रभाभिः शृङ्गारकल्पतरुपुष्पविभू-
षिताभिः ।
देवांगनातुलितसौभगसौकुमार्यरूपाभिलाषमधुराकृति-
रंजिताभिः ॥४
उत्तप्तहेमकलशोपमचारूपीनवक्षोरुहद्वयभरानतमध्यमाभिः ।
श्रोणीभराक्रमणखेदपरिश्रितासृगारक्तपावकरसारुणितां-
घ्रिभूभिः ॥५
केयूरहारमणिकंकणहेमकंठसूत्रामलश्रवणमण्डलमंडिताभिः ।
स्रग्दामचुम्बितसकुन्तकेशपाशकांचीकलापपरिशिजित-
नूपुराभिः ॥६
आमृष्टरोषपरिसांत्वननर्महासकेलीप्रियालपनभर्त्सनरोषणेषु ।
भावेषु पार्थिवनिजप्रियधैर्यबन्धसर्वापहारचतुरेषु
कृतांतराभिः ॥७
श्री वसिष्ठजी ने कहा—सन्तुलित महेन्द्र की नगरी के प्रभाव वाले उस पुर में मुनिवर की धेनु ने उन गृहों में इसके पश्चात् उनके ही योग्य नर-नारियों के समुदायों की रचना भी कर दी थी ॥१॥ अब जो नारीगणों का निर्माण उस पुर में किया था उनकी वेष-भूषा—रूप माधुर्य—सौन्दर्य