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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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१४२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ध्यानेन देवदेवेशं ददर्श परमेश्वरम् ।
स्वस्थांतःकरणो मैत्रः सर्वबाधाविवर्जितः ॥३६
चिंतयामास देवेशं ध्याने दृष्ट्वा जगद्गुरुम् ।
ध्येयावस्थितचित्तात्मा निश्चलेंद्रियदेहवान् ॥३७
आकालावधि सोऽतिष्ठन्निवातस्थप्रदीपवत् ।
जपंश्च देवदेवेशं ध्यायंच्च स्वमनीषया ॥३८
आराधयदमेयात्मा सर्वभावस्थमीश्वरम् ।
ततः स निष्फल रूपमेश्वरं यन्निरंजनम् ॥३६
परं ज्योतिरचिंत्यं यद्योगिध्येयमनुत्तमम् ।
नित्यं शुद्धं सदा शांतमतींद्रियमनौपमम् ।
आनंदमात्रमचलं व्याप्ताशेषचराचरम् ॥४०
चिंतयामास तद्रूपं देवदेवस्य भार्गवः ।
सुचिरं राजशार्दूल सोऽहंभावसमन्वितः ॥४१

ध्यान के द्वारा राम ने देवों के भी देवेश्वर भगवान् शङ्कर का दर्शन प्राप्त कर दिया था । उनका अन्तःकरण परम स्वस्थ था तथा वह सबका मित्र और समस्त बाधाओं से रहित था ।३६। इन जगद्गुरु को ध्यान में देखकर उसने देवेश्वर का चिन्तन किया था । वह अपने ध्येय प्रभु में अवस्थित चित्त और आत्मा वाला था । उसकी इन्द्रियां और देह निश्चल थे ।३७। वह अपने काल की अवधि तक निर्वात स्थान में दीपक के समान वहाँ पर स्थित रहा था । वह अपनी बुद्धि से देवदेव का जप तथा ध्यान करता हुआ वहाँ पर स्थित था ।३८। उस अमेय आत्मा वाले ने सब भावों में स्थित ईश्वर की आराधना की थी । इसके अनन्तर उस प्रभु का चिन्तन किया था जो फल रहित रूप है—ईश्वर और जो निरंजन है ।३६। जो परम ज्योति स्वरूप अचिन्तनीय-योगियों के द्वारा ध्यान करने के योग्य और सर्वोत्तम है । जो नित्य शुद्ध, सदा शान्त-इन्द्रियों की पहुँच से परे और उपमा से रहित है । जो केवल आनन्द के स्वरूप वाला अचल और समस्त चर और अचर में व्याप्त है ।४०। ऐसे देवों के देव के उस रूप का उस भार्गव ने हे राज शार्दूल ! बहुत समय ध्यान किया था और वह सोऽहं भाव में समन्वित हो गया था अर्थात् ध्येय और ध्याता की एक रूपता हो गयी थी ।४१। ❀