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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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१४० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

गिरिकंदरसंसक्तकिन्नरीसमुदीरितैः ।
सतालनादैरुदितैर्भूताशेषदिशामुखम् ।।२६
अरण्यदेवतानां च चरंतीनामितस्ततः ।
अलक्तकरसक्लिन्नचरणांकितभूतलम् ।।२७
मयूरकेकिनीवृन्दैः संगीतमधुरस्वरैः ।
प्रवृत्तनृत्तं परितो विततोदग्रबर्हिभिः ।।२८
किसी स्थल पर संरब्ध बहुत से शबरों के द्वारा प्रसक्त रीछों के यूथ पतियों के आनस में एक दूसरे के साथ संमर्द में शिलाएं भग्न हो गयीं थीं ।२२। कहीं पर पर्वत की कुञ्जों में करिणियां क्रीड़ाएं कर रही थीं और वहाँ पर कोई करी नहीं था तब करेणु पर मत्तगज दौड़कर चले जा रहे थे इस प्रकार से वहाँ कानन समाकलित था ।२३। कहीं पर वहाँ ऐसा भी बल था जहाँ पर सोते हुए सिंहों के मुखों के श्वासों की वायु से सैकड़ों गुहाएं पूरित हो रहीं थीं और वनों में बड़े भारी भय के कारण मृगगण शङ्कित होकर ही विहार कर रहे थे ।२४। किसी जगह पर यह वन चमरी गौओं के द्वारा क्रीड़ा का स्थल बना हुआ था जिनके पूँछों में कांटे लगे हुए थे और उनसे लोम टूट गये थे । जिसके कारण वे भयभीत होकर मन्दगति से विच-रण कर रही थीं ।२५। कहीं पर गिरि की कन्दराओं में से सक्त किन्नरियों के समुदाय थे और उनके द्वारा कहे हुए ताल के नादों तथा गीतों से सभी दिशाएँ पूरित थीं ।२६। उस महान् गिरि पर का वन इधर-उधर विचरण करती हुईं अरण्य देवताओं के चरणों में लगे हुए महावर के रस से वह भूतल चरणों के चिह्नों से अङ्कित हो रहा था ।२७। सङ्गीत के मधुर स्वरों से समन्वित-मयूर-मयूरियों के झुण्ड अपनी पंखों को फैलाकर कहीं पर आनन्द पूर्वक नृत्य कर रहे थे ।२८।

रामो मतिमतां श्रेष्ठस्तपसे च मनो दधे ।
शाकमूलफलाहारो नियतं नियतेंद्रियः ।।२६
तपश्चचार देवेशं विनिवेश्यात्ममानसे ।
भृगूपदिष्टमार्गेण भक्त्या परमया युतः ।।३०
पूजयामास देवेशमेकाग्रमनसा नृप ।
अनिकेतः स वर्षासु शिशिरे जलसंश्रयः ।।३१