संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरशुराम का संवाद ] [ १३१
करने वाले मृगों के शब्दों से जहाँ पर कण फैले हुए हैं तथा अनालीढ आतप
की छाया में नीवारों की राशि जहाँ पर सूख रही है ऐसा वह सुरम्य
आश्रम आश्रय है ॥४५॥ जिस आश्रम में समय पर अग्नि में आहुतियाँ दी
जाती हैं और जहाँ पर अतिथियों के समुदाय का अर्चन एवं सत्कार किया
जाया करता है । जिस आश्रम में भेदों के छन्दों का अभ्यास किया जाता
है तथा जो कुछ भी शास्त्रों में कहा गया है उसका चिन्तन किया जाता है
॥४६॥ पढ़े जाने वाले सम्पूर्ण स्मृति प्रतिपादित तथा वैदिक अर्थ का विचार
किया जाता है । जिसमें देवों और पितृगणों का यजन प्रारम्भ कर दिया
गया है तथा जो आश्रम सभी प्राणियों के लिए परम सुन्दर है ॥४७॥ जिस
परम सुरम्य आश्रम में बहुत से तपस्वी गण विद्यमान हैं और जो कापुरुष
नहीं हैं उन्हीं के द्वारा सेवित है यह तपश्चर्या की वृद्धि करने वाला—परम
पुण्यमय और सभी जीवों के सुखों का स्थल है ॥४८॥ जिनका एकमात्र तप
ही धन है उन तापसों के आनन्द का यह आश्रय देने वाला है और यह ऐसा
दिखलाई देता है मानो यह दूसरा ब्रह्मलोक ही हो । पुष्पों की सुगन्ध से
भ्रमण करते हुए भ्रमरों की गुञ्जार से यह आश्रम गुञ्जित है ॥४६॥
सर्वंतो वीज्यमानेन विविधेन नभस्वता ।
एवंविधगुणोपेतं पश्यन्नाश्रममुत्तमम् ॥५०
प्रविवेश विनीतात्मा सुकृतीवामरालयम् ।
संप्रविश्याश्रमोपांतं रामः स्वप्रपितामहम् ॥५१
ददर्श परितो राजन्मुनिशिष्यशतावृत्तम् ।
व्याख्यानवेदिकामध्ये निर्विष्टं कुशविष्टरे ।
सितश्मश्रु जटाकूर्चब्रह्मसूत्रोपशोभितम् ॥५२
वामेतरोरुमध्यास्त वामजंघेन जानुना ॥५३
योगपट्टेन संवीतास्वदेहम् विपुंगवम् ।
व्याख्यानमुद्राविलसत्सव्यपाणितलांबुजम् ॥५४
योगपट्टोपरिन्यस्तविभ्राजद्वामपाणिकम् ।
सम्यगारण्यवाक्यानां सूक्ष्मतत्त्वार्थसंहतिम् ॥५५
विवृत्य मुनिमुख्येभ्यः श्रावयंतं तपोनिधिम् ।
पितुः पितामहं दृष्ट्वा रामस्तस्य महात्मनः ॥५६