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सर्वकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 356, कुल 380 में से

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जीव-रक्षा के सञ्चियम

यहुत सहायक होता है। जो खियों अपनी आयु से छोटी हैं, वे पुत्री ही हैं। उनको पुत्री वाले शब्दों से ही पुकारना चाहिये।

कई पुरतकों में यह बात पही गई है कि इस प्रकार कई खियों ने अपने सतील की रक्षा की है। शत्रुओं या दुराचारियों के अधिकार में आते ही, उन्होंने कहा कि मैं आपकी धर्म-पुत्री हूँ, जो चाहें सो करें। इस पर उन लोगों के हृदय झिल गये, और अत्याचार के लिये हाथ न उठ सके, बल्कि उन लोगों ने उन खियों को पुत्री की भाँति, उनके घर पहुँचा दिया। अतएव अपने से छोटी आयु वाली खियों के प्रति पुत्री-भाव रखना बहुत ही श्रेयस्कर है।

(३७) भाव की निर्मलता

सुचिकानां सहस्रैस्तुदकुलुम्ब शतान्यपि।
न श्रुद्ध्यन्ति दुरात्मानां, येषां भावो न निर्मलः।

( दश-स्वप्नि )

जिन लोगों का भाव निर्मल ( शुद्ध ) नहीं, वे दुरात्मा हज़ारों मन भिड़ी और सैकड़ों घड़े जल से भी शुद्ध नहीं किये जा सकते।

“भावेहि विद्यते देवस्तस्माद्भावेहि कारणम् ।”

भाव में ही देवता बसते हैं, अतः भाव ही प्रधान है।

भाव ही सब कुछ है। इसी भाव के प्रभाव से लोग ईश्वर तक को प्राप्त कर लेते हैं। पर वह भाव होना चाहिये सच्चा; जिस पुरुष का भाव निर्मल है, उसे संसार ही निर्मल दिखाई पड़ता