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सर्वकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 380 में से

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पृष्ठ 255

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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२—ऐसे वीर्य तथा रज को गर्भोधान के अतिरिक्त किसी न्यर्थ सम्भोग में न व्यय करना चाहिये।

३—ऐसे अमूल्य वीर्य तथा रज की आवश्यकता न हो, तो शरीर से पृथक् न करना ही उत्तम है।

४—ऐसे वीर्य रज से कान्ति, आयु, शक्ति, बुद्धि, ज्ञान, सहिष्णुता, नीति, तेजस्विता तथा विनय-शीलता की वृद्धि होती है।

५—एक वर्ष के ब्रह्मचर्य से शरीर में अपरिमित वीर्य हो जाता है, जिससे की मनुष्य सब कुछ कर सकता है।

७—वीर्य का स्थान और परिमाण

शुक्ल सौम्यं सितं क्षिप्यं, बल पुष्टिकरं स्मृतम् ।
गर्भबीजं वपुः सारो, जीवस्याश्रयः स्मृतम् ॥

( वैश्व-गान् )

शुक्ल ( वीर्य ) जीवनी शक्ति का बढ़ाने वाला, श्वेत-वर्ण, चिकना बल तथा पुष्टि कारक होता है। यह गर्भ का बीज, शरीर का सार रूप तथा जीव का प्रधान आश्रय होता है।

वीर्य के स्थान और परिमाण के सम्बन्ध में बहुत से लोगों के मन में कुधारणार्थ उत्पन्न हो गई हैं। अतएव हम महर्षियों के लेख से दोनों बातों का निराकरण किये देते हैं।

यथा पयसि सर्पिस्तु, गृहश्वेत्तौ रसो यथा ।
प्रवं हि स्रकले काये, शुक्लं तिष्ठति देहिनाम् ॥

( वैश्व० )