ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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ब्रह्मचारी के कर्तव्य कर्म
नित्यं स्नात्वा शुचिः कुर्यादेवधिपितु तर्पणम् ।
देवताभ्यर्चनं ऋचैव, सविदाद्यान मेव च ॥
सदैव स्नान करके पवित्रता से देव, ऋषि और पितरों का
तर्पण तथा देव-पूजन और अभिहोत्र करता रहे ।
उदकुम्भं सुमनसो, गोशङ्खमुत्तिका कुशान् ।
आहरेद्यावदथानि, भैरुं चाहुरहस्यरेत् ॥
जल का घड़ा, फूल, गोबर और कुश, जिस वस्तु की
जितनी आवश्यकता हो, उतनी ही लावे । और निरन्तर भिक्षा
भागने जाया करे ।
दूरादाहस्य समिधः, सन्निद्ध्याद्विहायसि ।
सायं प्रातश्च जुह्यतामिन्द्रमन्तद्वितः ॥
दूर से समिधा ( होम की लकड़ी ) लाकर उसमें स्थान पर
घरे और उससे आलस्य-रहित होकर सायं और प्रातःकाल अग्नि-
होत्र करे ।
स्वमे सित्का ब्रह्मचारी, द्विज शुक्रमकामतः ।
आत्माकर्मचर्यवित्वाभिः, पुनर्मासितुं जपेत् ॥
यदि विना इच्छा के स्वप्न में वीर्य गिर जाय तो, स्नान कर
सूर्य भगवान् की पूजा के पश्चात् “पुनर्मासितिन्द्रियम्” नाम
की ऋचा का जप करे ।
शरीरञ्चैव वाचञ्च, बुद्धिन्द्रिय मनोसिच ।
नियम्य प्राज्ञकलितद्वेष्टीक्षमाणी गुणोमुखम् ॥
शरीर, वाणी, बुद्धि, इन्द्रिय और मन को अधिकार में करके
नम्रता-पूर्वक गुरु के सममुख रहा करे ।
कुर्याद्व्ययनञ्चैव, ब्रह्मचारी यथा विधिः ।
विधि त्यक्त्वा ऋकुर्वाणो, न स्वाध्याय फलं लभेत् ॥