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सर्वकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 199 में से

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

सी लकड़ी डाल देने से आगी बुझ सकती है।” हम कहते हैं, “अधिक विषय सेवन करने से फिर तुम भी अकाल में बुझ जाओगे ! एक शराबी ने ऐसा ही किया । एक दिन उसने खूब शराब पी ली । नतीजा यह हुआ कि एक ही घंटे में उसकी दुर्बल बनी हुई खोपड़ी नशे के मारे फट गई और वह मर गया । यथाति राजा ने अपने पुत्र की भी आयु ली और तमाम उम्र भर उसने विषय-सेवन किया परन्तु उसकी शान्ति नहीं हुई । अन्त में वह चर्या बन गया, उसको क्षय हो गया । इसी कारण संत उपदेश करते हैं:—

( भजन ध्रुव-गजल की )

“विषयों से मन को तृप्त कराना नहीं अच्छा ।
जलती अगिनि को घी से बुझाना नहीं अच्छा ॥ १ ॥
सुख भोगते ये जगत् के सभी हैं नाशमान ।
तृष्णा बढ़ा के जी को फँसाना नहीं अच्छा ॥ २ ॥
है गच्छतीति* जगत् धाम दुःख का भारी ।
रंग रंग के खेल देख लुभाना नहीं अच्छा ॥ ३ ॥
“धन धाम इष्ट मित्र रूप नारि और पुत्र ।
हरगिज धमण्ड इनका न करना कभी अच्छा ॥ ४ ॥
‘वामन’ है आयु वीततो अब से भी जरा चेत ।
दुर्लभ शरीर पाके गँवाना नहीं अच्छा ॥ ५ ॥
अतएव, प्यारे भाइयो ! जहाँ तक हो सके वहाँ तक, मनुष्य को

  • जानेवाला किंवा बदलने वाला जगत् ।