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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 434 में से

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पृष्ठ 97

* दक्षद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति * ९५


भूत, अग्नि और महेश्वर हैं। ब्रह्मावर्त, सुरावर्त और कामावर्त आपके ही नाम हैं। आपको नमस्कार है। आप कामदेवके विग्रहको दग्ध करनेवाले हैं। कर्णिकार (कनेर) पुष्पोंकी माला आपको अधिक प्रिय है। आप गौओंके नेता, गोप्रचारक (इन्द्रियोंके संचालक) तथा गौओंके स्वामी नन्दीपर सवारी करनेवाले हैं।

तीनों लोकोंकी रक्षा आपके ही हाथोंमें है। गोविन्द (गोरक्षक), गोपालक और गौओंके मार्ग भी आप ही हैं। आपका मुख पूर्ण चन्द्रके समान आह्लादक है। आप सुन्दर मुखवाले हैं। जिनका मुख सुन्दर नहीं है, जो मुखसे रहित हैं, जिनके चार या अनेक मुख हैं तथा जो सदा युद्धमें सम्मुख डटे रहते हैं, वे सब भी आपके ही स्वरूप हैं। आप हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा), शकुनि (वाज), धनद (धन देनेवाले), धनके स्वामी, विराट्, अधर्मका नाश करनेवाले, महादक्ष, दण्डधारी तथा युद्धके प्रेमी हैं। खड़े रहनेवाले, स्थिर, स्थाणु, निष्कम्प, अत्यन्त निश्चल, दुर्वारण (कठिनतासे निवारण किये जाने योग्य), दुर्विषह (असह्य), दुस्सह और दुरतिक्रम (दुर्लङ्घ्य) हैं। आपको धारण करना या वशमें लाना कठिन है। आप नित्य दुर्दम्य (कठिनतासे दमन करने योग्य), विजय एवं जय हैं। आप शश (खरगोश)-रूप हैं। चन्द्रमा आपके नेत्र हैं। आप एक ही साथ शीत और उष्ण दोनों ही धारण करते हैं। क्षुधा, तृषा, बुढ़ापा, आधि (मानसिक पीड़ा) और व्याधि भी आप ही हैं। व्याधिके नाशक और पालक भी आप ही हैं। आप सहन करने योग्य, यज्ञरूपी मृगके मारनेवाले व्याध, व्याधियोंके आकर (भंडार) तथा अकर (कुछ भी न करनेवाले) हैं। आप शिखण्डी (मोरपंखधारी), पुण्डरीक (कमलरूप) तथा पुण्डरीकलोचन हैं। दण्डधृक् १, चक्रदण्ड२ तथा रौद्रभागाविनाशन३— ये सब आपके ही नाम हैं।* आप विष, अमृत, देवपेय, दुग्ध, सोम, मधु, जल तथा सब कुछ पान करनेवाले हैं। बल और अबल सब आप ही हैं।

आप धर्ममय वृषभके शरीरपर सवार होने


१. दण्डधारी, २. चक्रद्वारा दण्ड देनेवाले, ३. रुद्रके भागका नाश न होने देनेवाले।

* ब्रह्मा कालाग्निवक्त्रश्च दण्डो मुण्डस्त्रिदण्डधृक्। चतुर्युगश्चतुर्वेदश्चतुर्होत्रश्चतुष्पथः ॥
चातुराश्रम्यनेता च चातुर्वर्ण्यकरश्च ह। क्षराक्षरः प्रियो धूर्तो गणैर्गण्यो गणाधिपः ॥
रक्तमाल्याम्बरधरो गिरीशो गिरिजाप्रियः। शिल्पीशः शिल्पिनः श्रेष्ठः सर्वशिल्पप्रवर्तकः ॥
भगनेत्रान्तकश्चण्डः पूष्णो दन्तविनाशनः। स्वाहा स्वधा वषट्कारो नमस्कार नमोऽस्तु ते ॥
गूढव्रतश्च गूढश्च गूढव्रतनिषेवितः। तरणस्तारणश्चैव सर्वभूतेषु तारणः॥
धाता विधाता संधाता निधाता धारणो धरः। तपो ब्रह्म च सत्यं च ब्रह्मचर्यं तथाऽऽर्जवम् ॥
भूतात्मा भूतकृद्भूतो भूतभव्यभवोद्भवः। भूर्भुवः स्वरितश्चैव भूतो ह्यग्निर्महेश्वरः ॥
ब्रह्मावर्तः सुरावर्तः कामावर्त नमोऽस्तु ते। कामबिम्बविनिर्हन्ता कर्णिकारस्त्रजप्रियः ॥
गोनेता गोप्रचारश्च गोवृषेश्वरवाहनः। त्रैलोक्यगोप्ता गोविन्दो गोप्ता गोमार्ग एव च ॥
अखण्डचन्द्राभिमुखः सुमुखो दुर्मुखोऽमुखः। चतुर्मुखो बहुमुखो रणेष्वभिमुखः सदा ॥
हिरण्यगर्भः शकुनिर्धनदोऽर्थपतिर्विराट्। अधर्महा महादक्षो दण्डधारो रणप्रियः ॥
तिष्ठन् स्थिरश्च स्थाणुश्च निष्कम्पश्च सुनिश्चलः। दुर्वारणो दुर्विषहो दुःसहो दुरतिक्रमः॥
दुर्धरो दुर्वशो नित्यो दुर्दर्पो विजयो जयः। शशः शशाङ्कनयनः शीतोष्णः क्षुत्तृषा जरा॥
आधयो व्याधयश्चैव व्याधिहा व्याधिपश्च यः। सह्यो यज्ञमृगव्याधो व्याधीनामाकरोऽकरः॥
शिखण्डी पुण्डरीकक्ष पुण्डरीकावलोकनः। दण्डधृक् चक्रदण्डश्च रौद्रभागाविनाशनः॥

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