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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

पृष्ठ 397, कुल 434 में से

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पृष्ठ 397
  • भगवान् वासुदेवका माहात्म्य * ३९५
    हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं। जिनका मन
    जगन्मय भगवान् वासुदेवमें नहीं लगा, उनके जीवनसे
    और पशुओंकी भाँति चेष्टासे क्या लाभ हुआ।
    मुनियोंने कहा- सर्वलोकवन्दित पिनाकधारी
    भगवान् शंकर ! हम भगवान् वासुदेवका माहात्म्य
    सुनना चाहते हैं।
    महादेवजी बोले- सनातन पुरुष श्रीहरि ब्रह्माजीसे
    भी श्रेष्ठ हैं। उनका श्रीविग्रह श्यामवर्ण है, उनकी
    कान्ति जाम्बूनद नामक सुवर्णके समान है। वे
    मेघरहित आकाशमें सूर्यकी भाँति प्रकाशित होते
    हैं। उनके दस भुजाएँ हैं। वे महातेजस्वी और
    देवशत्रुओंके नाशक हैं। उनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका
    चिह्न शोभा पाता है। वे इन्द्रियोंके नियन्ता और
    सम्पूर्ण देववृन्दके अधिपति हैं। उनके उदरसे
    ब्रह्माका और मस्तकसे मेरा प्रादुर्भाव हुआ है।
    सिरके बालोंसे नक्षत्र और ग्रह तथा रोमावलियोंसे
    देवता और असुर उत्पन्न हुए। उनके शरीरसे ऋषि
    और सनातन लोक प्रकट हुए हैं। वे साक्षात्
    ब्रह्माजी तथा सम्पूर्ण देवताओंके निवासस्थान हैं।
    वे ही इस सम्पूर्ण पृथ्वीके रचयिता और तीनों
    लोकोंके स्वामी हैं। स्थावर-जङ्गम भूतोंका संहार
    करनेवाले वे ही हैं। वे देवताओंके भी देवता
    और रक्षक हैं। शत्रुओंको ताप देनेवाले, सर्वज्ञ,
    सर्वस्रष्टा, सर्वव्यापी और सब ओर मुखवाले हैं।
    तीनों लोकोंमें उनसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं
    है। वे सनातन महाभाग गोविन्दके नामसे विख्यात
    हैं। देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये मानव-
    शरीरमें अवतीर्ण होकर वे समस्त भूपालोंका युद्धमें
    संहार करेंगे। भगवान् विष्णुके बिना देवगण अनाथ
    हैं। अतः उनके बिना वे संसारमें देव-कार्यकी
    सिद्धि नहीं कर सकते। सम्पूर्ण भूतोंके नायक
    भगवान् विष्णु समस्त प्राणियोंद्वारा वन्दित हैं। वे
    देवताओंके नाथ, कार्य-कारण-ब्रह्मस्वरूप और
    ब्रह्मर्षियोंको शरण देनेवाले हैं। ब्रह्माजी उनकी
    नाभिमें हैं और मैं शरीरमें। सम्पूर्ण देवता भी
    उनके शरीरमें सुखपूर्वक स्थित हैं। वे भगवान्
    कमलके समान नेत्र धारण करते हैं। उनके गर्भमें
    श्रीका निवास है। वे सदा लक्ष्मीजीके साथ रहते
    हैं। शार्ङ्ग नामक धनुष, सुदर्शन चक्र और नन्दक
    नामक खड्ग उनके आयुध हैं। सम्पूर्ण नागोंके
    शत्रु गरुड उनकी ध्वजामें विराजमान हैं। उत्तम
    शील, शौच, इन्द्रियसंयम, पराक्रम, वीर्य, सुदृढ़
    शरीर, ज्ञान, सरलता, कोमलता, रूप और बल
    आदि सभी गुणोंसे वे सुशोभित हैं। उनके पास
    सम्पूर्ण दिव्यास्त्रोंका समुदाय है। उनके योगमायामय
    सहस्रों नेत्र हैं। वे विकराल नेत्रोंवाले भी हैं।
    उनका हृदय विशाल है। वे अपनी वाणीसे मित्रजनोंकी
    प्रशंसा करते हैं। कुटुम्बी और बन्धुजनोंके प्रेमी
    हैं। क्षमाशील, अहंकारशून्य और वेदोंका ज्ञान
    प्रदान करनेवाले हैं। वे भयातुरोंके भयका अपहरण
    और मित्रोंके आनन्दकी वृद्धि करनेवाले हैं। समस्त
    प्राणियोंको शरण देनेवाले और दीनोंके पालक
    हैं। शास्त्रोंके ज्ञाता और ऐश्वर्यसम्पन्न हैं। शरणमें
    आये हुए मनुष्योंके उपकारी और शत्रुओंको भय
    देनेवाले हैं। नीतिज्ञ, नीतिसम्पन्न, ब्रह्मवादी, जितेन्द्रिय
    और उत्कृष्ट बुद्धिसे युक्त हैं।
    वे देवताओंके अभ्युदयके लिये महात्मा मनुके
    वंशमें अवतार लेंगे। उस अवतारमें वे ब्राह्मणोंका
    सत्कार करनेवाले, ब्रह्मस्वरूप और ब्राह्मणोंके
    प्रेमी होंगे। यदुकुलमें अवतीर्ण भगवान् श्रीकृष्ण
    राजगृहमें जरासंधको जीतकर उसकी कैदमें पड़े
    हुए राजाओंको छुड़ायेंगे। पृथ्वीके समस्त रत्न
    उनके पास संचित होंगे। वे अत्यन्त पराक्रमी
    होंगे। भूतलपर दूसरा कोई वीर उन्हें पराक्रमद्वारा
    परास्त न कर सकेगा। वे विक्रमसे सम्पन्न समस्त
    राजाओंके भी राजा और वीरमूर्ति होंगे। भगवान्
    वासुदेव द्वारकामें रहते हुए दुर्बुद्धि दैत्योंको पराजित
    करके इस पृथ्वीका पालन करेंगे। आप सब लोग