संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* सुपर्णा-संगम, पुरूरवस्तीर्थ, पञ्चतीर्थ, शमीतीर्थ, सोम आदि तीर्थोंकी महिमा * १८१
आदि जो कुछ भी करता है, वह सब अभिलषित
वस्तुओंको देनेवाला तथा नैष्कर्म्यसे भी बढ़कर
मोक्षका साधक माना गया है।
शमीतीर्थके नामसे जिसकी प्रसिद्धि है, वह
भी सब पापोंकी शान्ति करनेवाला है। नारद!
उस तीर्थकी कथा सुनाता हूँ, सावधान होकर
सुनो। पूर्वकालमें प्रियव्रत नामसे प्रसिद्ध क्षत्रिय
राजा हो गये हैं। उन्होंने गोदावरीके दक्षिण-
तटपर अश्वमेध-यज्ञकी दीक्षा ली। उस यज्ञके
पुरोहित हुए वसिष्ठजी। एक दिन उस यज्ञमें
हिरण्यक नामका दानव आया। महर्षि वसिष्ठने
अपने ब्रह्मदण्डसे सब दैत्योंको मार भगाया।
तदनन्तर पुनः यज्ञ आरम्भ हुआ। दैत्य अपनी
सेनाके साथ भाग खड़ा हुआ। वहाँ निम्नाङ्कित
तीर्थोंने अश्वमेध-यज्ञके फल दिये—शमीतीर्थ,
विष्णुतीर्थ, अर्कतीर्थ, शिवतीर्थ, सोमतीर्थ और
वसिष्ठतीर्थ। यज्ञ समाप्त होनेपर देवताओं और
ऋषियोंने वसिष्ठ और प्रियव्रतसे कहा—इन तीर्थोंने
अश्वमेध-यज्ञका फल दिया है; अतः इनमें स्नान-
दान करनेसे मनुष्य अश्वमेध-यज्ञका पुण्य-फल
प्राप्त करेगा—इसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है।
मुने! गौतमीमें एक स्थानपर अनेक नद-
नदियाँ मिली हैं। उन सबके नामपर पृथक्-पृथक्
तीर्थ हैं। उन तीर्थोंके नाम ये हैं—सोमतीर्थ,
गन्धर्वतीर्थ, देवतीर्थ, पूर्णातीर्थ, शालतीर्थ, श्रीपर्णा-
संगम, स्वागता-संगम, कुसुमा-संगम, पुष्टि-संगम,
कर्णिका-संगम, वैणवी-संगम, कृशरा-संगम, वासवी-
संगम, शिवशर्मा, शिखी, कुसुम्भिका, उपारथ्या,
शान्तिजा, देवजा, अज, वृद्ध, सुर और भद्र
आदि। ये तथा और भी बहुत-से नद-नदीगण
गौतमीमें मिले हैं। पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, वे
सभी देवगिरिपर गये थे। फिर वे ही क्रमशः
गङ्गामें आ मिले। कोई नदीरूपमें था और कोई
नदरूपमें। किसीका रूप सरोवरके आकारमें था
और किसीका स्रोतके आकारमें। वे ही सब तीर्थ
पृथक्-पृथक् विख्यात हुए। उन सबमें किया
हुआ स्नान, जप, होम, पितृ-तर्पण आदि कर्म
समस्त कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला और
मुक्तिदायक माना गया है। जो इनके नामोंका पाठ
अथवा स्मरण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो
भगवान् विष्णुके धाममें जाता है।
वृद्धा-संगम नामक एक प्रसिद्ध तीर्थ है, जहाँ
वृद्धेश्वर नामक शिवका निवास है। उस तीर्थकी
कथा सब पापोंका नाश करनेवाली है। पूर्वकालमें
एक महातपस्वी मुनि थे। उनका नाम वृद्धगौतम
था। वे जब बालक थे, तब किसी तरह पिताने
उनका यज्ञोपवीतमात्र कर दिया। इसके बाद वे
बाहर भ्रमण करनेको चले गये। उन्हें केवल
गायत्री-मन्त्र याद था। वे वेदोंका अध्ययन और
शास्त्रोंका अभ्यास नहीं कर सके। केवल गायत्रीका
जप और अग्निहोत्र नियमपूर्वक कर लेते थे।
इतनेसे ही उनका ब्राह्मणत्व सुरक्षित था। विधिपूर्वक
अग्निकी उपासना और गायत्री-जप करनेसे
उनकी आयु बहुत बढ़ गयी। यों भी उनकी
अवस्था अधिक हो चुकी थी। किंतु विवाह न
हो सका, कोई उन्हें कन्या देनेवाला नहीं मिला।
गौतम भिन्न-भिन्न तीर्थों, वनों और पवित्र
आश्रमोंमें भ्रमण करते रहे। घूमते-घूमते शीत-
गिरिपर चले गये और वहीं रहने लगे। वहाँ
उन्होंने एक रमणीय गुफा देखी, जो लताओं और
वृक्षोंसे घिरी हुई थी। उसमें एक अत्यन्त दुर्बल
वृद्धा तपस्विनी रहती थी, उसके सब अङ्ग
शिथिल हो गये थे। वह वीतरागा ब्रह्मचारिणी
थी और एकान्तमें रहा करती थी। उसे देख
मुनिश्रेष्ठ गौतम नमस्कारके लिये खड़े हो गये।
वृद्धाने कहा—आप मेरे गुरु होंगे, अतः