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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

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पृष्ठ 179

* पौलस्त्य, अग्नि और ऋणमोचन नामक तीर्थोंका माहात्म्य * १७७

इन्द्रका प्रथम अभिषेक नर्मदा-तटपर हुआ। वहाँ उनके मलका शोधन होनेके कारण उस देशका नाम मालव पड़ा। तत्पश्चात् वे गौतमी गङ्गाके तटपर लाये गये। वहाँ पुण्या नदीके जलमें गौतमीका जल लाकर उसीसे समस्त देवता, ऋषि, मैं, विष्णु, वसिष्ठ, गौतम, अगस्त्य, अत्रि, कश्यप, अन्यान्य ऋषि, यक्ष तथा पन्नगोंने इन्द्रका अभिषेक किया। तत्पश्चात् मैंने उन्हें अपने कमण्डलुके जलसे भी अभिषिक्त किया। इस प्रकार वहाँ 'पुण्या' और 'सिक्ता' दो नदियाँ हो गयीं और वे दोनों गौतमी गङ्गामें आकर मिलीं।

उन दोनोंके संगम मुनियोंद्वारा सेवित विख्यात तीर्थ बन गये। तबसे उस तीर्थको पुण्यासंगम कहते हैं। सिक्तासङ्गमका ही नाम इन्द्रतीर्थ हो गया। वहाँ सात हजार मङ्गलमय तीर्थ निवास करने लगे। उन तीर्थोंमें तथा विशेषतः संगमके जलमें जो स्नान-दान किया जाता है, वह सब अक्षय जानना चाहिये। इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। जो इस पवित्र उपाख्यानको पढ़ता अथवा सुनता है, वह मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा होनेवाले समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।


पौलस्त्य, अग्नि और ऋणमोचन नामक तीर्थोंका माहात्म्य

**ब्रह्माजी कहते हैं—**उसके आगे पौलस्त्य-तीर्थ है, जो मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाला है। मैं उसके प्रभावका वर्णन करता हूँ—वह छिने हुए राज्यकी भी प्राप्ति कराता है। विश्रवा मुनिके ज्येष्ठ पुत्र कुबेर, जो ऋद्धि-सिद्धिसे सम्पन्न और उत्तर दिशाके स्वामी हैं, पहले लङ्काके राजा थे। उनके सौतेले भाई रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण बड़े बलवान् थे। यद्यपि वे भी विश्रवाके ही पुत्र थे, तथापि राक्षसपुत्री कैकसीके गर्भसे उत्पन्न होनेके कारण राक्षस कहलाते थे। वे तीनों भाई तपस्या करनेके लिये वनमें गये। वहाँ उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की और मुझसे वरदान प्राप्त किया। तदनन्तर अपने मामा मारीचके तथा नाना और माताके कहनेसे रावणने कुबेरसे लङ्काकी राजधानी अपने लिये माँगी। इस बातको लेकर दोनों भाइयोंमें भारी शत्रुता हो गयी। फिर तो देवताओं और दानवोंमें भयंकर युद्ध हुआ। रावणने अपने बड़े भाई कुबेरको युद्धमें हराकर पुष्पक विमान और लङ्कापुरीपर अधिकार जमा लिया तथा तीनों लोकोंमें घोषणा करा दी कि जो

मेरे भाईको आश्रय देगा, वह मेरे हाथसे मारा जायगा। कुबेरको कहीं आश्रय न मिला। तब वे अपने पितामह पुलस्त्यके पास गये और उन्हें प्रणाम करके बोले—'मेरे दुष्ट भ्राताने मुझे लङ्कासे निकाल दिया। बताइये, अब क्या करूँ? अब मेरे