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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 315 में से

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पृष्ठ 172
  • ६६ -
    राम जनम घरि षोखियो ।
    काक गङ्गा घरु नीची दिट्टि ॥
    टहण आग्य णे घरीयं दुसार¹ ।
    राजनी² रीति³ जाणि⁴ पँटाणी⁵ धार ॥
    मुरुप लोग न जाणही⁶ ।
    चोर जुवारी कह्⁷ छाछ⁸ ॥ 7
    तिण स्य⁹ हसी म¹⁰ वाखिण्यो ।
    राजा जी पूच्छै¹¹ भरम की बात ॥
    झूठी साची थे मत कहइजउ¹² ।
    मुहम्र झाझट थे देज्यो हाथ ॥

यह छंद ग्र० २ खण्ड २ में ५६, आ० ६ खण्ड २ में ५७, आ० ६
में ६३ है । किंतु आ० ६ में ८, ६, १० इस प्रकार हैं :—
८ सुणि रावल तु हज किया जाय ।
६ राज मांहि नातोभिगण करो ।
१० राजा तेड़ी चोपड़ी देयि ।
१ अ० २ तोसार ।
२+३ आ० ६ राजा की नीति, आ० १२ राजनीतिरीति ।
४ अ० २, आ० ६ जिसी, आ० ६ जाणो, आ० १२ छै ।
५ आ० ६ पेदाकी, आ० १२ पांटानी ।
६ आ० ६ न जायइ सार ।
७ आ० ६ अझर, आ० १२ अउर ।
८ आ० १२ कलाल ।
६ अ० २ ईशाण, आ० ६ णाण, आ० ६ तिआस्यू, आ० १२ मु ।
१० आ० १२ इसीय न ।
११ आ० १२ पूछेछै ।
१२ आ० १२ कहो ।
यह छंद ग्र० २ खण्ड २ में ६०, आ० ६ खण्ड २ में ५८,
आ० ६ में ६४ तथा आ० १२ में ८५ है । इस छंद की अंतिम दो