बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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उधग जाय कौ परीय जगीस ।
राजा ब्राह्मण कौ^१ देह घई^२ सीधि ॥
दूणि विधि^३ राज मादे संचरे^४ ।
चट्ठा राजा सभा परधान^५ ॥
तिथि सु^६ मीठा बालिज्यो^७ ।
नाई साहूणी^८ दण्ड^९ मान ॥
पांदीय^१० सरिसठ मति^११ इसउ^१२ ।
तटह राह घोडा इसी भीतर गोठि ॥
तथा अ० १२ में ८४ है । लेकिन इस छंद तथा इस प्रति की छंद सख्या
६१ में निम्न अन्तर है —
पंक्ति ४. उतह पाणि उगादिया होरा की थाइ ।
" ५. मुझ दिण छिण तू जिन रहइ ।
" ६. वेगि मिलिस्या तुम्ह नइ आइ ।
आ० १२ में इस छंद की दूसरी पंक्ति नहीं है ।
आ० १२ में इस छंद की तीसरी पंक्ति के स्थान पर है—
"बोल्यो पलिस्था आपणी ।"
तथा अंतिम पंक्ति के स्थान पर है—
"वेगा अबिह्या तुरीय पलाथि ।"
१ आ० ६ नीति गति, अ० २ कुवरधन ।
२ अ० २ पेमउँ, आ० ६ धण दीयै ।
३ आ० ६ ईणि परि ।
४. अ० २ राज मादे पहिरहूँ, आ० ६ राजमाहे बेसझ्यो, आ० ६ राज
माहि गम करे ।
५ अ० २, आ० ६ राज चलायक अ० परधान ।
६+७. अ० २, आ० ६ इसासु विरोष नहुँ बोलिजइ ।
८. अ० २, आ० ६ नावी साहुणी, आ० ६ नाई साहुणी ।
९ अ० २ मुधराई, आ० ६ सुदधी, आ० ६ दोनु ।
१०. अ० २ दासी ।
११+१२ अ० २ मिय इसोउ, आ० ६ मति इसै ।