बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें– ५ –
लिपि—देवनागरी अक्षर । सुरक्षित स्थान—अभय
जैन भण्डार, बीकानेर ।
पुष्पिका—संवत् १७२४ वर्षे मगयशीर वदि १५ ।
[ गुप्त सं० आरम्भ—सुंमम श्रीजिनाय ॥ गवरी का नंदन त्रिभोवन
समूह न० १६, सार । नाववेदां थारो उद्रि भण्डार । कर जोडी नाहलो
संवेत प्र० ] कवि । मूनांश वाढण तिलक सींदूर । एक दंता मुषक
महि । ज्योंण कि रोहणी हठ तपे सूर । सुवण मोदो पर
कामिणी । हंस गमणि मृगालोचणी नारि । सीस समारि
दिन गणै । साघण उमीद्धि शम्भु हुयार । नाह न देखि
चिहूंदिसा । शिख सरण्यो उजगाणा की नारि । तो ज्याय
दीढाडो सूरतां ॥
अन्त—गजपगमणी तृगालोचणो नारि । सेकि संभारि
दिन गणै । साधण उमीद्धे थीह हुयारि । नाह न देखू' चिहू
दिशा । किण कोड हो उभगंणिया की नारि । सा जाय दीढाढा
सुरता ॥
रचना तिथि—सवत् बार बाहोतरा मझारि । ज्येष्ठबदी
नवमी बुधवार । नाहल रसायण आरम्भ्यो । सारदा तुठी छै
ब्रह्मकुमार । कास मीशं मूपक मंडणी । रास परगांत ए
बीसलराय ।
[ ७ ] नाम—बीसलदेव रासो ! काग़ज—देशी
[ गुप्त प० ( हाथ का बना हुआ ) । पत्र—३० पत्र दोनों ओर लिखे
समूह न० ६, हुए । आकार—१० इ० × ४½ इ० । पंक्तियों--११
संकेत “बी०”] पंक्तियाँ प्रत्येक पृष्ठ पर । छंद सख्या--२४८ पद । प्रकार-
पुराना, अंतिम पत्र तथा अन्य पत्रो के किनारे सुसज्जित ।
पूर्ण । अक्षर—देवनागरी लिपि । सुरक्षित स्थान—
अभयजैन भण्डार, बीकानेर ।
पुष्पिका—संवत् १७३७ वर्षे ज्येष्ठ सुदि १० दिने ।
लिखितं पडित कीर्ति विज्ञास गणिना । साध्यो राजलछमी
तत्शिष्यश्री सुमतिलष्मी तत्शिष्यश्रो प्रेम लदमी
पठनाय॑म् ॥