बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें-- ४ --
नागरी । सुरक्षित स्थान—बीकानेर में बड़े उपासरे के
बृहद्—ज्ञानभण्डार के एक गुटके में ।
पुष्पिका—इति श्री वीसल दे रास संपूर्णः ॥ संवत
१६८१ वर्षे भाद्र सुदि ६ परणी सुत बाभरे । लिषतं चवरा ॥
सुभंभवतु ॥
आदि—श्री गुरुभ्यो नम ॥ राग केदारउ ॥ गडरि
मा मदन त्रिभुवन सार । माइ मेरुइ धारइ उदर भण्डार ।
एक दंतउ भुज झलहलइ ! मूसका वाहण तिळक सिन्दूर ।
कर ज्योडि नरपति भणइ । जाणि कर रोहियो जियड
सप्पड सूर ।
अन्त—कनरू काया जैसी कुंकु की रोल । कठिन पयोधर
हेम कचोल । केलगर भुजि सी आंगुली । धारउं उद्वगाया
पचइ नह कहिवाण । राणी राजा स्यु मिला । तिम पुखि
संसारि मिलि ज्यो सउकोइ ।
रचना तिथि—नहीं है ।
[ ४ ] यहप्रति बालोतरा (जोधपुर राज्य) के भावर्दीय
शास्त्रगच्छ भण्डार में है । इसकी पत्र सख्या ४२ और
छंद सख्या २४८ है । इसका लेखन काल सं० १६८५ है ।
इसमें रचना काल "सयल सहस तिउतरइ" दिया है ।
[ ५ ] यह प्रति जैसलमेर में वृद्धिचन्द जी के संग्रह
में सुरक्षित है । १४ पत्रों की इस प्रति में २४२ पद्य हैं ।
रचना काल का उल्लेख नहीं है। केवल भा० सु० ५
रो, का उल्लेख है । प्रति सं० १७२३ की लिखित है ।
[ ६ ] नाम वीसलदेव रास । कागज—देशी
(हाथ का बना हुआ) । पत्र—३० पृष्ठ दोनों तरफ लिखे
हुए । आकार--१० इ० x ४ १/२ इ० । पंक्तियाँ--१६
पंक्तियाँ प्रत्येक पृष्ठ पर । पद्य संख्या--२६६, चार खण्डों
में क्रमानुसार ३३, ३९, १०२ और ९१ छन्द हैं । प्रकार—
पुराना, अच्छी हालत में, पूर्ण ।