बीजगणितम् (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय समीकरण एवं बीजगणित सूत्र सटीक)
Bijaganitam of Bhaskaracharya II with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९६ बीजगणिते
अत्र यदि भवेत् क = शे. वि - १ तदा नी - का = शे (द्वि - प्र)। एवम्
पी - का = शे (तृ - प्र)। अथैवम् पी - नी = शे (तृ - द्वि) अतः
नी - का = १०, पी - का = ४००। पी - नी = ३९०। पूर्वं समधनानि
शे. प्र. क - का (शे. वि - १) = शे. द्वि. क - नी (शे. वि - १) =
शे. तृ. क - पी (शे. वि - १)।
क = शे. वि - १ अतः शे. प्र - का = शे. द्वि. - नी = शे. तृ. - पी
अतः शे. प्र - का = ३० - का। शे. द्वि - नी = ४० - नी।
शे. तृ - पी = ५०० - पी। यद्यन्तरम् ३० - का इत्यादि एकं कल्प्यते तदा
का = २९, नी = ३९, पी = ४९९ तत्र सप = शे. वि - १ = क अत एव विष्णुदैवज्ञेन
मतिमतोक्तं "शेषविक्रयहृतेष्टविक्रयः शीतरश्मिरहितो भवेत् कयः।" अथ यदि
क = शे. वि - १ तदा प्र. क = प्र. शे. वि - प्र अतो विक्रयेण ह्रियते प्र. क / वि
= प्र. शे. वि - प्र / वि = प्र. शे. - प्र / वि ततो यदि
वि > प्र, द्वि, तृ, तदा का = प्र. शे - १ = २९ } अत्रापि यदि
" नी = द्वि. शे - १ = ३९ }
" पी = तृ. शे - १ = ४९९ }
वि > प्र, द्वि, तृ तदैव पूर्वदर्शितसमधनरूपेषु का, नी, पी इत्येषां वर्णानां मानैः
प्र. शे - १, द्वि. शे - १, तृ. शे - १ एभिस्तथाप्यते च प्रत्यक्षतः समताऽवलोक्य-
तेऽतः "पृथगनाधिक इष्टविक्रयः कल्प्य इत्यमवगम्य धीमता" इत्युत्तरार्धमपि सुसं-
गोपपन्नम्।
अथ क = शे. वि - १ अतः वि = क + १ / शे = क + १ / ५ अत्र प्रथमलब्धिः
का = २९ तत्र शेषफलानि अ, द्वितीयलब्धिः नी = ३९, अत्र शेषफ = इ,
एवं तृतीयलब्धिः पी = ४९९, अत्र शेषफ = उ, अतः अ = सध - २९ / ५, इ = सध - ३९ / ५
उ = सध - ४९९ / ५
अतो निधीयते नवनवाब्धि-४९९ भ्योऽधिकेनैव सर्वधनेन भवितव्यम्। यस्मा-
न्नवनवाब्धीन् विशोध्य पञ्चभिर्नि शेषा लब्धिर्भवेत् तथा कल्प्यते पञ्चाधिकनवनवाब्धि-